आदिवासी समुदाय की आधार जल, जंगल, जमीन को बचाने के लिए आज भी संवैधानिक लड़ाई के पक्ष में सरकार असंवैधानिक काम करते नक्सली बताने में तुली। पांचवी अनुसूचित क्षेत्र बुरुंगपाल में एक स्टील प्लांट के लिए सरकार ने संविधान की उड़ाई धज्जियां। बस्तर में है आदिवासियों को स्वायत्त शासन का अधिकार आदिवासी ग्रामीणों की संवैधानिक संघर्ष की कहानी।
बस्तर:-
आदिवासी समुदाय की आधार जल, जंगल, जमीन को बचाने के लिए आज भी संवैधानिक
लड़ाई के पक्ष में है। संविधान में दिए सारे अधिकारों के तहत अपनी लड़ाई लड़ रहे है। लेकिन मौजूदा सरकार आदिवासियों के
संवैधानिक अधिकारों का हनन खाकी के दमन से करने में लगी हुई है। ऐसा ही छत्तीसगढ़
के बस्तर संभाग में एक गांव बुरुंगपाल है बुरुंगपाल जगदलपुर जिला मुख्यालय से करीब
35 किलोमीटर
दूर तोकापाल ब्लॉक के अंतर्गत आता है बस्तर वैसे तो वामपंथ उग्रवाद के लिए जाना
जाता है, लेकिन
यहां के आदिवासी शुरुवाती दौर से ही संवैधानिक लड़ाई के पक्ष में रहे है। अपने
पुरखों की नार बुमकाल परंपरा को ही वर्तमान ग्रामसभा की जननी मानते हैं इसलिए
कोयतुर लोकतंत्र के जनक हैं। बुरुंगपाल के आदिवासी ग्रामीण अपनी जमीन बचाने
संविधान में दिए अधिकारों के तहत लड़ाई जारी रखे हुए है, यह लड़ाई 1992 से चली आ रही है जब बुरुंगपाल में
मुकुंद आयरन और एसएम डायकेम के स्टील प्लांट का भूमिपूजन और शिलान्यास किया गया
था। मालूम को कि प्लांट के विरोध में आदिवासी लामबंद हो गए थे आंदोलन की अगुवाई
यहां कलेक्टर रह चुके समाजशास्त्री डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा ने की थी। बस्तर से
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर तक पद यात्रा और जगह-जगह इसका विरोध किया गया था। ग्रामीणों को उनके संवैधानिक अधिकारों
के बारे में जागृत कर एकजुटता का काम स्व. ब्रम्हदेव शर्मा ने किया था। ड़ॉ शर्मा
पेसा कानून के ड्रॉफ्ट कमेटी के सदस्य थे। आप को बता दे कि बुरुंगपाल में ही रह कर
डॉ शर्मा ने पेसा कानून का ड्राफ्ट तैयार किया था इसके बाद 73 वां संविधान संशोधन विधेयक में इसे
पारित किया गया था। स्टील प्लांट आने को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट में एक याचिका भी
लगाई गई थी। जिसका फैसला चार साल बाद ग्रामीणों के पक्ष में आया था, जिसे आज भी ग्रामीण विजय उत्सव के रूप
में मनाते हैं।
लेकिन ग्रामीणों की यह खुशी ज्यादा दिन की नही रही फिर प्लांट के काले बादल उन पर मंडराने लगे , जमीन छीने जाने का डर फिर उन्हें सताने लगा। 2013-14 में फिर ग्रामीणों को पता चला कि स्टील प्लांट उनके गांव लगने वाला है । और आखिरकर 9 मई 2015 को दक्षिण बस्तर की एक सभा मे पहुंचे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में बुरुंगपाल गांव में अल्ट्रा मेगा स्टिल प्लांट स्थापित करने के लिए एनएमडीसी अथवा सेल के साथ एमओयू साइन किया गया। ग्रामीणों को अखबार के माध्यम से पता चला कि उनके गांव में स्टील प्लांट लगने को लेकर एमओयू साइन हो गया है। एमओयू साइन के 24 घंटे के भीतर ही ग्रामीण सरकार खिलाफ लामबंद हो गए,अर्थात सर्वोच्च संवैधानिक बल प्राप्त पारंपरिक ग्रामसभा ने आदेश पारित कर दिया क्योंकि पारंपरिक ग्रामसभा को अनुसूचित क्षेत्रों में विधायिका, न्यायपालिका व कार्यपालिका की बल अनुछेद 13(3)क,244(1), पांचवी अनुसूची के पैरा 2 व 5 तथा भारत सरकार अधिनियम 1935 के अनुच्छेद 91,92 से प्राप्त है। अनुसूचित क्षेत्रों की परंपरागत ग्रामसभाओं की आदेश निर्णय प्रस्ताव को वहां की प्रशासन व मीडिया विरोध बता देती है जबकि वह विरोध नही जनादेश होती है। इस बात को माननीय उच्चतम न्यायालय ने समता का फैसला1997 में साफ कही है कि अनुसूचित क्षेत्रों में केंद्र व राज्य सरकार या गैर आदिवासी की एक इंच जमीन नहीं है। इसलिए इन क्षेत्रों में लोकसभा ना विधानसभा सबसे ऊंची पारंपरिक ग्रामसभा (वेदांता का फ़ैसला2013) से ज्यादा क्लियर होता है। इसलिए इन क्षेत्रों में कोई भी जमीन अधिग्रहण निर्माण परियोजना नई योजना लागू करने से पहले पारंपरिक ग्रामसभा की अनुमति आदेश अनिवार्य होती हैं परंतु जिला प्रशासन संविधान के विरुद्ध इन क्षेत्रों में जनादेश की आदेश को हमेशा कुचलने की तमाम उदाहरण पेश करती हैं जो कि इन क्षेत्रों की विकास नहीं होने तथा अशांति की मुख्य वजह है। ग्रामीणों का आरोप था कि स्टील प्लांट आने से उनकी जमीनों का असंवैधानिक अधिग्रहण किया जाएगा। बुरुंगपाल के आलवा डिलमिली, मावलीभाठा के साथ-साथ 14 गांव के ग्रमीणों ने स्टील प्लांट नहीं लगाने का संवैधानिक आदेश करने लगे हैं।
जानकारी के अनुसार ग्रामीणों ने सरकार
पर आरोप लगाया कि पांचवी अनुसूचित क्षेत्र में ग्राम सभा की सहमति/आदेश के बिना
किसी भी प्रकार का प्लांट,खनन
निर्माण लगने नही देंगे, ग्रामीणों
ने ग्राम सभा कर स्टील प्लांट नहीं लगाने का विश्वास प्रस्ताव पारित कर प्रशासन को
अगवत कराया। गांव के जनपद सदस्य रूखमणी कर्मा कहती है कि प्रशासन ने उनके विरोध को
विकास कार्यो में बाधा पंहुचाना बताया था। जबकि यह संवैधानिक आदेश है प्रशासन के
अनुसार स्टील प्लांट लगने से गांव में विकास की बात कही गई थी।
असंवैधानिक रूप से गाँव की जमीन में खोला जा रहा थाना
हाल ही
में ग्रामीणों के विरोध को देखते हुए डिलमिली गांव में थाना खोला जा रहा है जिसका
विरोध ग्रामीण कर रहे है, डिलमिली
के सरपंच आयतू मंडावी कहते है कि कोडेनार में पहले से थाना स्थित है फिर 3 किमी की दुरी पर डिलमिली में थाना खोला
जा रहा है. यह एक षड्यन्त्र के तहत काम हो रहा है पहले थाना खोलेंगे फिर स्टील
प्लांट के जमीन अधिग्रहण के लिए ग्रामीणों को जुल्म कर मजबूर करेंगे, डिलमिली के सरपंच ने एक प्रेस
विज्ञप्ति के माध्यम से मीडिया को बताया कि थाने खोलने का संवैधानिक आदेश कर रहे
ग्रामीणों को नक्सलियों की संज्ञा दी जा रही है.ग्रामीणों को पुलिस द्वारा धमकाया
जाता है. आयतू कहते है डिलमिली, बुरुंगपाल, मावलीभाठा
में किसी भी प्रकार का नक्सली गतिविधि नही होता है, वो आगे कहते है कि बस्तर में भारतीय
संविधान की धारा 244(1) 5 वी
अनुसूचि लागू है कानून कहता है कि स्थानिय जनसमुदाय के बगैर सहमति या ग्राम सभा
किए बिना किसी भी प्रकार का निर्माण करना, जमीन अधिग्रहण करना संविधान का उलंघन
है, वही पुलिस
प्रशासन का कहना है कि आस-पास नक्सली गतिविधि के चलते डिलमिली में थाना खोलने का
निर्णय लिया गया है।
जानकारी
हो कि पांचवी अनुसूचित क्षेत्र से तात्पर्य संविधान की पांचवी अनुसूची में निहित
जनजाति क्षेत्रो में जनजातियों का प्रशासन और नियंत्रण उन्नति व कल्याण का अधिकार
जनजातीय समुदाय को है। जबकि राज्य सरकार व जिला प्रशासन सामान्य क्षेत्र की संविधान ( अनुछेद245) को थोपती है। जनजाति क्षेत्रो में
ग्राम सभा का निर्णय ही सर्वमान्य होता है। भारत मे 10 राज्य पांचवी अनुसूची में आते है। जहां
जनजाति का प्रशासन और नियंत्रण होता है।
बस्तर
अनुसूचित जनजातिय क्षेत्र है जहा संविधान में निहित पांचवी अनुसूची लागू है जो कि
भारत सरकार अधिनियम 1935 की अनुच्छेद 91,92 की मूल आधार पर बनी है. उस वक्त प्लांट के विरोध में आदिवासी
लामबंद हो हुए थे आंदोलन की अगुवाई यहां कलेक्टर रह चुके और पेसा कानून के
इंजीनियर डॉ. बी.डी.शर्मा ने बुरुंगपाल में ही रह कर आन्दोलन की रूपरेखा तय की थी, यही नही उन्होंने पेसा कानून का
ड्राफ्ट भी यही रह कर तैयार किया था।
पेसा कानून लाने का उद्देश्य आदिवासी
क्षेत्रो में अलगाव की भावना को कम करना और सार्वजनिक संसधानो पर बेहतर नियंत्रण
तथा प्रत्यक्ष सहभागिता तय करना था. जिसकी जमीन उसकी खनिज इसका मूल उद्देश्य था
इनका नारा था मावा नाटे,मावा राज. आदिवासियों की लम्बी लड़ाई के बाद 73 वा संविधान संशोधन में पेसा कानून को
सम्मिलित किया गया.
संविधान का गुड़ी (मन्दिर) है गाँव में...
2 हजार की
आबादी वाले गांव की खास बात यह है कि यह देश में अकेला गांव है, जहां भारत के संविधान का (मंदिर) गुड़ी
है, यह कोई
भव्य (मंदिर) गुड़ी नही बल्कि आधारशिला पर संविधान में निहित जनजातिय क्षेत्रो में
पांचवी अनुसूची के प्रावधान और अधिकार लिखा हुआ है। 6 अक्टूबर1992 को जब इस गुड़ी की आधारशिला रखी गयी थी
तब से ग्रामीण इसे ही गुड़ी समझते है और इसकी पूजा(सेवा) करते है। अब देश के कई
अनुसूचित क्षेत्रों में पांचवी अनुसूची क्षेत्र की संवैधानिक प्रावधान लिखित
पथरगड़ी लग रही हैं। करीब 25 साल पहले
आदिवासियों ने स्टील प्लांट के खिलाफ एक आंदोलन किया था। इसके बाद यह (मंदिर) गुड़ी
स्थापित हुआ. एसएम डायकेम के स्टील प्लांट के जमीन अधिग्रहण को लेकर जबलपुर
हाईकोर्ट में याचिका लगाईं गई थी, याचिका का फैसला ग्रामीणों के पक्ष में आया था, जिस दिन फैसला हाईकोर्ट में आया उसी
दिन को ग्रामीण विजय उत्सव के रूप में यहाँ एकजुट होकर मनाते है. आज भी ग्रामीण
विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा (बस्तर राज के पेनों की महाजतरा) के मावली परघाव के दो
दिन पूर्व बुरुंगपाल पंचायत के आसपास के 50 गांव के आदिवासी अनुसूचित जाति ओबीसी
समुदाय इकट्ठा होकर संविधान में आदिवासीयो व पाँचवी अनुसूचित के प्रावधान अधिकार
शक्तियों का वाचन , चर्चा
परिचर्चा एवं
वर्तमान में एक्ससीलुडेड एरिया की संविधान प्रावधान की संवैधानिक सभा पारम्परिक
ग्रामसभा की प्रस्ताव निर्णय को लेकर ग्राम प्रमुख अवगत कराते हैं यह 25सालो से लगातार चलते आ रहा है।
आदिवासी समुदाय संवैधानिक लड़ाई के पक्ष
में।
आदिवासी समुदाय आज भी संवैधानिक लड़ाई के पक्ष
में है, संविधान
में दिए सारे आधिकारो के तहत अपनी लड़ाई लड़ रहे है, बूरूंगपाल सरपंच तथा तत्कालीन संघर्ष
समिति (1992)के सदस्य
एवं पेशा कानून के ड्रापटिंग कमेटी के सदस्य सोमारू कर्मा ने उस दौरान पेसा कानून
के इंजीनियर डॉक्टर बी•डी•शर्मा के योगदान को बताते है कि यदि शर्मा जी का सकारात्मक सहयोग नहीं
मिलता तो आदिवासी की जल जंगल जमीन की लड़ाई कमजोर हो जाती क्योकि "पेशा
अधिनियम " आदिवासियों की ग्राम गणराज्य की लड़ाई "मावा नाटे मावा
राज" के दहाड़ से
बना है इस सच्चाई को बहुत कम
ही लोग जानते हैं कि पेशा कानून बुरूंगपाल में लिखा गया । प्रधानमंत्री की मौजूदगी
में स्टील प्लांट लागने को लेकर हुए एमओयू साइन का भी हम संवैधानिक लड़ाई लड़ेंगे.
आप को बता
दे कि एक्ससीलुडेड एरिया एक्ट जिसे इंडिया गवर्नमेंट act 1935 के कंडिका 91 व 92 में अंग्रेजों ने स्थान दिया प्राप्त
किये। आगे के संविधान में इन्हीं एक्ससीलुडेड एरिया को अनुसूची पांच व अनुच्छेद 244 (1) में स्थान दिया गया। एक्ससीलुडेड एरिया
आदिवासियों की स्वशासन के लिये हैं जिसे सरकार ने ग्रामसभा का नाम दिया है। आदिवासी समुदाय में
हजारों वर्षों से ग्रामसभा के द्वारा कार्यपालिका, न्यायपालिका व विधायिका का कार्य नार
बुमकाल के द्वारा संचालित होते आ रही है। जिसे आज ग्रामसभा कहते हैं। आदिवासियों
में कोई भी सामूहिक कार्य को समुदाय की सहमति अनिवार्य होती है यही गणतंत्र की मूल
भावना भी है।
विदित हो कि एक्ससीलुडेड क्षेत्रों की संवैधानिक प्रावधानों की उल्लघंन किया जा रहा है जो लोकतंत्र की हत्या है। इसका सबसे ज्यादा उलंघन सरकारी अधिकारियों के द्वारा किया जा रहा है जिसके कारण आदिवासी समुदाय में घोर आक्रोश दिखाई दे रही है। जबकी सरकार को लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए। सरकार अनुच्छेद 13(3)क, 19(5,6),25, 244(1), 275, 330,332,340,342 की मूल भावना से परे कार्य कर रही है। सरकार को चाहिए कि जनता के लिए स्थापित प्रावधानों की पूर्ण पालन करे।
एक्ससीलुडेड
क्षेत्र में संविधान का उल्लंघन के कारण ही युद्ध जैसे हालात बन गई है। इसका
समाधान अनुसूचित क्षेत्र की प्रावधानों को पूर्ण रूप से लागू करने से 6 माह में हालात सामान्य हो जाएगा।
अनुसूचित क्षेत्र में नगरीय निकाय असंवैधानिक है शासन प्रशासन अनुच्छेद 243ZC का उल्लंघन कर रही है। एक्ससीलुडेड
क्षेत्र में नगरीय निकाय असवैधानिक है वर्तमान सत्तासीन सरकार इसको बढ़ावा दे रही
है जो सीधा सीधा आदिवासियों के अधिकारों व संविधान को कमजोर करने वाला साजिश है।
पेशा कानून के अनुसार किसी भी ग्राम पंचायत में सरपंच पंच व सचिव सर्वोच्च नहीं
हैं पारम्परिक ग्रामसभा बडी होती है सरपंच व सचिव पंच एक सरकारी एजेंट होते हैं
पूरा अधिकार पारम्परिक ग्रामसभा की निर्णय की होती है। ग्रामसभा के निर्णय सर्व
मान्य व सर्वोच्च हैं लेकिन इसके उलट व्यवस्था जिला प्रशासन द्वारा सरपंच व पंच को
सर्वोच्च बता दिखाकर ग्रामसभा के प्रस्ताव निर्णय को अमान्य किया जा रहा है जो कि
संविधान के विपरीत है। सरपंच एक मात्र जनता के प्रतिनिधि हैं लेकिन यहां तो सरपंच
तानाशाही व्यवस्था को लेकर पनप रहे हैं क्योंकि जिला प्रशासन उन्हें गलत दिशा दे
रही है । इसी के कारण भूमि अधिग्रहण, योजनाओं का निर्माण, में फर्जी ग्रामसभाओं के द्वारा या
बन्दूक के नोक पर प्रस्ताव बनाया जा रहा है जिससे जनता की विश्वास लोकतंत्र के ऊपर
से डिगने लगी है जो कार्य गांव की जनता ने अस्वीकार कर दिया उसे कैसे थोप दी जाती
है यह बहुत ही गम्भीर संकट है । नगरनार स्टील प्लांट, बैलाडीला आयरन ओर प्रोजेक्ट इसका
बेहतरीन उदाहरण हैं। सबसे दुर्भाग्य यह है कि यह हत्या सरकार के नुमाइंदे जो कि
भारत सरकार की सेवार्थ हैं संविधान की प्रावधान की पूर्ण पालन कर अनुपालन करने की
प्रण लेकर आते हैं लेकिन वे ही जनता की लोकतांत्रिक अधिकार की हत्या कर रहे हैं।
लोकतंत्र की हत्या से भविष्य में एक्ससीलुडेड क्षेत्रों में खतरनाक हालात निर्मित
हो सकती है। एक्ससीलुडेड क्षेत्र मतलब नॉन ज्यूडिशियल क्षेत्र में राज्य सरकार
राज्यपाल को अंधेरे में रख कर ज्यूडिशियल सिस्टम को कैसे थोप रही हैं??? नॉन ज्यूडिशियल क्षेत्रों में नॉन
ज्यूडिशियल प्रसाशनिक व्यवस्था की व्यवस्था भारत सरकार अधिनियम1935 व भारत का संविधान अधिनियम1950 में भी निहित है।


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