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Thursday, January 11, 2018

आदिवासी समाज ने दिखाया सरकार को संविधान का आईना,भू राजस्व संहिता संशोधन विधेयक पर लिया यू टर्न

छत्तीसगढ़ भू राजस्व संहिता संशोधन विधेयक को सरकार ने वापस लेने का फैसला किया है, ये फैसला कैबिनेट की बैठक में लिया गया, छत्तीसगढ़ सरकार ने यह कदम आदिवासी समाज के बढ़ते विरोध के मद्देनजर उठाया है. कैबिनेट की बैठक से पहले सर्व आदिवासी समाज ने मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह से मुलाक़ात कर इसे वापस लेने की मांग की थी. आदिवासी समाज का कहना था कि यह विधेयक संविधान के विपरीत काला कानून है, वही प्रदेश की विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने इसे उधोगपतियो को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया था.
जानकारी हो कि भू राजस्व संशोधन विधेयक में बीजेपी घिरती नजर आ रही थी, चुनावी साल में सरकार का यह फैसला भारी पड़ सकता था. माना जा रहा है कि इसीकारण वश सरकार ने अपने कदम वापस खीच लिए.


जानकरी हो कि इस बार के छत्तीसगढ़ विधानसभा के शीतकालीन सत्र 21 दिसम्बर को विपक्ष के भारी विरोध के बिच सरकार ने भू राजस्व संहिता संशोधन विधेयक पारित किया गया था. राजस्व मंत्री प्रेम प्रकाश पांडे ने संशोधन विधेयक पेश करते हुए कहा था कि भू अजर्न कि प्रक्रिया सरल होने से विकास में आ रही अडचने दूर होगी. विधेयक पारित होने के 24 घंटे के भीतर ही आदिवासी समाज ने संविधान के विपरीत काला कानून बताते विरोध शुरू कर दिया था, सरकार ने विरोध को देखते हुए बीजेपी के आदिवासी विधयाको को भी सरकार का पक्ष रखने सामने किया था लेकिन आदिवासी समाज ने उन बीजेपी विधायको का भी सामाजिक बहिष्कार कर लगातार विरोध करते रहे.

बस्तर संभाग के सर्व आदिवासी समाज के संभागीय अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने कहा कि यह संविधान की जीत है सरकार संविधान के विपरीत गैरसंवैधानिक कार्य नही कर सकती, उन्होंने आगे कहा कि सडक की लड़ाई के साथ संवैधानिक लड़ाई भी लडी गई संशोधन विधेयक के खिलाफ बस्तर से 5000 से भी ज्यादा  ग्राम सभा के प्रस्ताव राज्यपाल को भेजे गए थे. 

आदिवासी समुदाय ने लैंड रेवेन्यु रूल्स 1879,1921,1972 भारत सरकार अधिनियम 1935, भारत का संविधान के अनुच्छेद 13(3)क, 19(5),19(6),244(1) पांचवी अनुसूचि का पैरा 2 व पांच जिसमें अनुसूचित क्षेत्र में लोकसभा व विधानसभा के कोई विधेयक कानून सीधे लागू नहीं होता का पालन करने हेतु पारम्परिक ग्रामसभाओं के द्वारा आदेश जारी किया गया था। इसी का परिणाम है की सरकार को पीछे हटना पड़ा। आने वाले दिनों में समाज सरकार के द्वारा 70 वर्षों से पांचवी अनुसूचि संविधान को छुपा कर रखे थे इसका मुहतोड़ जवाब दिया जाएगा।संविधान की अवहेलना व उलंघन करने वाले ओ आई जी एस व मंत्रियों के विरुद्ध आई पी सी की धारा 124 क के तहत मामला दर्ज करने का आदेश विधिक पारम्परिक ग्रामसभाओं के द्वारा दिया जायेगा।


पारम्परिक ग्रामसभाओं की आदेश का पालन किया राज्यपाल ने

छत्तीसगढ़ भू राजस्व संहिता संशोधन विधेयक2017 को अनुसूचित क्षेत्र के परंपरागत ग्रामसभाओं ने लैंड रेवेन्यु रूल्स 1879,1921,1972 ,भारत सरकार अधिनियम 1935 के अनुच्छेद 91,92 ,भारत का संविधानअनुच्छेद 13(3)क,19(5),19(6),244(1) के विपरीत पाया। पूरे राज्य के विधिक पारम्परिक ग्रामसभाओं ने  अपने संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए महामहिम राज्यपाल छत्तीसगढ़ को आदेश जारी करते हुए विधेयक में हस्ताक्षर नहीं करने का आदेश जारी किया गया था जिसका पालन महामहिम राज्यपाल ने किया है। इसके लिए पारम्परिक ग्रामसभाओं ने राज्यपाल को धन्यवाद ज्ञापित किया है।
पारम्परिक ग्रामसभा के आदेश का यह दिव्तीय अवसर पालन किया गया है। ज्ञात हो कि सामाजिक बहिष्कार अधिनियम को भी संविधान के विरुद्ध पाकर इस बात पर भी आदेश जारी किया गया था।जिसका अमल विधायिका ने किया था। ग्रामसभाओं को कार्यपालिका, विधयिका व न्यायपालिका का संवैधानिक शक्ति प्राप्त है ग्रामसभा ही लोकतंत्र का आधार है। अब सरकार को चाहिए कि संविधान कि अवहेलना व उलंघन करना बंद कर लीगिल कार्य ही करनी चाहिए ।

Wednesday, January 10, 2018

पहाड़ का सीना चीर कर कांकेर पुलिस व जिला प्रशासन पहुंचा ग्राम मर्रापी



कांकेर विकासखण्ड के ग्राम मरदापोटी का आश्रित ग्राम मर्रापी वाह गाँव है जो कांकेर जिला मुख्यालय से मात्र 20/22  किमी की दुरी पर स्थित पहाड़ी में बसा है, यहा आस –पास मरका, कुलमुच्चे गाँव भी पहाड़ी पर बसे है,

विगत दिनों संपन्न मरदापोटी जनसमस्या निवारण शिविर में पुलिस महानिरीक्षक बस्तर रेंज श्री विवेकानंद सिन्हा ने कांकेर के दो ग्रामों को गोद ग्राम लिए जाने की सलाह पुलिस प्रशासन को दी और उसके अनरूप कार्यवाही करने को कहा। उसी परिप्रेक्ष्य में पुलिस अधीक्षक श्री के.एल.ध्रुव व उप महानिरीक्षक श्री रतन लाल डांगी के मार्गदर्शन में ग्राम मर्रापी का चयन किया गया ।


आज मर्रापी गाँव में विकास कि बयार भ रही है कांकेर - - पहाड़ का सीना चीर कर जनसहयोग और पुलिस प्रशासन की मदद से निर्मित सड़क मार्ग से आज पुलिस के आलाअधिकारी और कलेक्टर श्री टामन सिंह सोनवानी के नेतृत्व में पूरा जिला प्रशासन ग्राम मर्रापी के ग्रामीणों के बीच पहुंचा और उनकी समस्याओं, मांगों का निदान किया।

आप को बता दे कि विगत दिनों संपन्न मरदापोटी जनसमस्या निवारण शिविर में पुलिस महानिरीक्षक बस्तर रेंज श्री विवेकानंद सिन्हा ने कांकेर के दो ग्रामों को गोद ग्राम लिए जाने की सलाह पुलिस प्रशासन को दी और उसके अनरूप कार्यवाही करने को कहा। उसी परिप्रेक्ष्य में पुलिस अधीक्षक श्री के.एल.ध्रुव व उप महानिरीक्षक श्री रतन लाल डांगी के मार्गदर्शन में ग्राम मर्रापी का चयन किया गया ।

यहां पर आठ किलोमीटर टेढ़ी-मेढ़ी लंबी पहाड़ी को चीर कर ग्राम वालों के सहयोग और पुलिस सुरक्षा के मध्य सड़क का निर्माण किया गया । संयुक्त रूप से आयोजित किए गए मोर मितान व जनसमस्या निवारण शिविर को संबोधित करते हुए पुलिस महानिरीक्षक श्री विवेकानंद सिन्हा ने कहा कि मर्रापी के ग्रामवासी सिर्फ सड़क मार्ग बनने मात्र से ही संतोष न करें। लगातार विकास के लिए संघर्ष करते रहें। उन्होंने संघर्ष की व्याख्या करते हुए कहा कि संग$हर्ष अर्थात संघर्ष । मिल कर जिस कार्य को करके हर्ष का अनुभव हो वही कार्य करें । अभी सड़क मार्ग बना है। इसी सीसी रोड़ बीटी रोड के लिए कोशिश करें। सतत् प्रयास जारी रखना होगा । उन्होंने ग्राम की महिलाओं, बच्चों को पुलिस की सबसे बड़ी ताकत बताते हुए कहा कि इनके सहयोग से क्षेत्र की नक्सली समस्याओं का निदान निकलेगा। उन्होंने ग्रामवासियों को  नातेदारों, रिश्तेदारों, दोस्तों, परिचितों से अपील की और कहा कि यदि कोई उनका परिचित अज्ञान्तावश अन्य संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त है तो उसे समाज की मुख्यधारा में शामिल करें। श्री सिन्हा ने समन्वित प्रयास से ग्राम के विकास का संकल्प लेने को कहा। श्री सिन्हा ने ने अन्य विकसित क्षेत्र के लोगों की तलना में मर्रापी वासियों को भी समकक्ष बताते हुए कहा कि प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती। उसका उदय कहीं भी हो सकता है। 
कलेक्टर श्री टामन सिंह सोनवानी ने कहा कि यह एक संयोग ही है, मर्रापी ग्राम पहुंचने का मुझे अवसर मिला। मुझे बताया गया की कोई 5-6 साल पहले विकास खण्ड अधिकारी यहां आए थे उसके बाद कोई भी अधिकारी कर्मचारी नहीं पहुंचा। श्री सोनवानी ने मोर मितान कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि पुलिस के अथक प्रयास से यहा पहुंच मार्ग बन सका और हम सभी यहां पहुंच सके हैं। हमारी पूरी कोशिश है कि हम विकास की किरणे उन सुदूर क्षेत्रों तक फैलायें जहां सूरज की रौशनी

 सौ. कांकेर जनसंपर्क विभाग द्वारा जनहित में जारी समाचार  



Monday, January 8, 2018

छतीसगढ़ के किसानों एकजुटता : खेती किसानी के संकट की जिम्मेदार सरकार की नीति और नीयत




रायपुर- छत्तीसगढ़ के अनेक किसान, खेतिहर, आदिवासी संगठनों एवं विस्थापन प्रभावितों के आंदोलनों का साझा सम्मलेन खेती-किसानी बचाने के नये और बड़े आंदोलनों के संकल्प के साथ संपन्न हुआ| छतीसगढ़ के किसानों की यह अब तक की सबसे बड़े स्तर की एकजुटता थी, जिसमे प्रदेश के तक़रीबन हर जिले के प्रतिनिधि शामिल थे| इसे अलग अलग आंदोलनों के नेताओं के साथ कई राष्ट्रीय नेताओं ने संबोधित किया|

अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव तथा नौ बार सांसद रहे हन्नान मौल्ला ने खेती-किसानी के संकटों के बुनियादी सवाल उठाते हुए कहा कि ये सरकारी नीतियां है जो बर्बादी मचा रही है| किसान खेती छोड़ना चाहते है, आत्महत्याएं कर रहे है, बर्बाद हो रहे है| मगर सरकार बजाय राहत देने के उनके ज़ख्मों पर नमक छिड़क रही है| प्रधानमंत्री डेढ़ गुना दाम के वादेपूरे नहीं कर रहे, वनाधिकार कानून लागू नहीं कर रहे| उन्होंने देश में बढ़ती किसान एकता की जानकारी दी कि 187 किसान संगठन कर्ज माफी और पूरे दाम की मांग पर इकट्ठा हुए है| छत्तीसगढ़ के किसान संगठन व आंदोलन भी इसका हिस्सा बनेंगे यह उम्मीद उन्होंने जताई है|

कृषि विशेषज्ञ व अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा ने तथ्यों और आंकड़ों के साथ बताया कि 1971 से लेकर आज तक जहाँ बाकी सब की आमदनी दो से तीन सौ गुना बढ़ गई किसान को नाममात्र भी नहीं मिला| लागत का मूल्य तक वसूल न हो पाने के कारण हर 40 मिनट में एक किसान आत्महत्या कर रहा है| इसी अनुपात में अगर धान-गेहूं के समर्थन मूल्य तय कर दिए जाए तोन किसान खेती छोड़ेगा, न नौजवान खेत छोड़कर भागेगा, न आत्महत्याएं होंगी| उन्होंने कहा कि इसके लिए किसान को अपनी एकता बनानी होगी, इस एकता का इस्तेमाल संघर्ष की चोट और चुनावी वोट में करना होगा|

स्वराज अभियान के नेता योगेन्द्र यादव ने संकल्प सम्मलेन को किसान आन्दोलन की कई धाराओं का संगम बताते हुए इसके आयोजन के महत्त्व को रेखांकित किया| उन्होंने कहा कि खेती से जुड़े खाद कंपनी, बीज और कीटनाशक कंपनियां एवं आढतिये व्यापारी सब मालामाल है, सिर्फ किसान ही क्यों तबाह है! इसके लिए उन्होंने सरकार की नीतियों को जिम्मेदार बताया और कहा कि 70 साल से लगातार फसल की कीमतों को दबा कर रखा गया- सरकार की नीतियां ही नहीं, नियत भी ख़राब है| अब किसान इनका समाधान चाहता है, उसे हासिल करने के लिए देश भर के पैमाने पर इकट्ठा हो रहा है| खेती से जुड़े सभी किसानों को पहली बार एक मंच पर लाया गया है| देश के किसानों की मांगों की भी उन्होंने विस्तार से व्याख्या की|

पूर्वकेन्द्रीय मंत्री अरविंद नेताम जी से छतीसगढ़ सरकार द्वारा भू-राजस्व संहिता में किये गए संशोधन को बेहद खतरनाक बताते हुए कहा कि यह आदिवासियों को समाप्त कर देने की बड़ी साजिश का हिस्सा है, जिस से सभी समुदायों को मिल कर लड़ना चाहिए क्यूंकि सिर्फ आदिवासियों की ही जल जंगल जमीन औरजिंदगी ही खतरे में नहीं पड़ेगी सभी समुदाय संकट में होंगे|

छतीसगढ़ बचाओ आन्दोलन के संयोजक आलोक शुक्ला, वरिष्ट समाजवादी नेता आनंद मिश्रा की अध्यक्षता मेंहुए इस संकल्प सम्मलेन का संचालन करते हुए किसान नेता नन्द कश्यप ने बताया कि किस प्रकार से धान बोने पर मुख्यमंत्री एक बयान देते है तथा मुख्य सचिव ठीक उसके प्रतिकूल बोलते है| लगता है राजनीतिक नेतृत्व नपुंसक हो गया है|

इस संकल्प सम्मलेन को संबोधित करने वालों में छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन, जिला किसान संघ राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (मजदूर कार्यकर्त्ता समिति), अखिल भारतीय किसान सभा (छत्तीसगढ़ राज्य समिति), छत्तीसगढ़  किसान सभा, हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति (कोरबा, सरगुजा), किसान संघर्ष समिति (कुरूद), आदिवासी महासभा (बस्तर), दलित आदिवासी मजदुर संगठन (रायगढ़), दलित आदिवासी मंच (सोनाखान), संयुक्त किसान संघर्ष मोर्चा (कांकेर),पेंड्रावन जलाशय बचाओ किसान संघर्ष समिति (बंगोली, रायपुर), भारत जन आन्दोलन सरगुजा व गाँव गणराज्य अभियान (सरगुजा), जनाधिकार संगठन (कांकेर), मेहनतकश आवास अधिकार संघ (रायपुर), जशपुर जिला संघर्ष समिति, भारतीय खेत मजदूर यूनियन (छत्तीसगढ़ राज्य समिति), राष्ट्रिय आदिवासी विकास परिषद् (छत्तीसगढ़ इकाई, रायपुर), छत्तीसगढ़ किसान महासभा, उर्जाधानी भू –विस्थापित कल्याण समिति (कोरबा), उधोग प्रभावित किसान संघ (बलोदाबाजार) शामिल रहे|

Sunday, January 7, 2018

सुरक्षाबलों ने गाय चरा रहे नाबालिक बच्चे को मारी गोली, एक बच्चा अब तक लापता

सुरक्षा बलों की गोली का शिकार फिर एक बार नाबालिक बच्चे हुए है जिसमे से एक बच्चा बोटीराम मरकाम घायल है और अपोलो अस्पताल बचेली में भर्ती है ।
वेब समाचार पोर्टल The Voices के हवाले से खबर है कि  रविवार दोपहर को अपोलो अस्पताल बचेली में करका गांव से एक 11 वर्षीय घायल बच्चे को भर्ती कराने ग्रामीण पहुंचे, बच्चे को कमर के नीचे गोली लगी थी ।

करका निवासी घायल बालक बोटीराम के मुताबिक शनिवार देर शाम करका की जंगलो में बोटिराम पिता पांडु अन्य बच्चों के साथ मवेशियों को ढूंढने गये हुये थे जहां सुरक्षाबलों के साथ आमना सामना हो गया पुलिस को देख बच्चे घबराकर भागने लगे तभी जवानों ने फायरिंग शुरू कर दी ।

जानकारी हो कि हाल ही में सोनी सोरी ने आरोप लगाया था कि गोमपाड में मछली पकड़ रही युवती सोयम रामे को सुरक्षा बलों द्वारा गोली मारी गई थी।

बोटिराम को कमर में गोली लगी है। जैसे तैसे भागकर अपनी जान बचाने में बालक बोटिराम कामयाब हुआ। ग्रामीण बोटिराम को कावड़ में लेकर पहाड़ी पार कर अकाशनगर तक लेकर आए और फिर अकाशनगर से एम्बुलेंस से अपोलो अस्पताल बचेली में रविवार दोपहर को बच्चे को भर्ती कराया गया ।

ग्रामीणों के मुताबिक बोटिराम के साथ गये सोमारू पिता हूंगा अब तक लापता है । जिसकी तलाश ग्रामीण कर रहे है ।

वेब पोर्टल The Voices को अपोलो अस्पताल के चिकित्सक प्रशासक एस एम हक ने बताया कि घायल बालक को कूल्हे में एक गोली मारी गई थी और गोली के छर्रे को निकाल दिया गया है बालक की स्थिति फिलहाल खतरे बाहर नज़र आ रही है ।
बस्तर रेंज के DIG पी. सुंदरराज ने The Voices पोर्टल को  कहा है कि घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस पार्टी इस घटना की जाँच के लिए रवाना हो गई है। उनका कहना है कि बीते दो तीन दिनों से सुरक्षाबलों की कार्यवाई में तीन नक्सलियों को मार गिराने में सफलता प्राप्त हुई है वहीं नक्सलियों के द्वारा की गई फायरिंग में एक जवान भी घायल हुआ है। पी. सुंदरराज कहते हैं कि पुलिस ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए है, ये भी हो सकता है कि नक्सलियों और सुरक्षाबलों के बीच हुई क्रॉस फायरिंग की जद में कोई ग्रामीण आ गया हो, लेकिन घटना की पूरी जांच के बाद ही पूरी स्थिति स्पष्ट हो पाएगी

छत्तीसगढ़: भाजपा सरकार की वादाखिलाफी के विरोध में कल राजधानी में जुटेंगे हजारों किसान

छत्तीसगढ़ :- छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि कर्ज माफ़ी, स्वामीनाथन आयोग की प्रमुख सिफारिशों के अनुसार लागत का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य, हर साल धान का 300 रूपये बोनस, भू-राजस्व संहिता में किए गए सभी आदिवासी विरोधी संशोधनों को रद्द कर जबरन भूमि अधिग्रहण को बंद करने, पांचवी अनुसूची, पेसा और वनाधिकार मान्यता कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने तथा मनरेगा में 250 दिन काम, 250 रूपये रोजी दिए जाने और इन मांगों पर पूरे प्रदेश में साझा आंदोलन विकसित करने के उद्देश्य से कल 8 जनवरी 2017 को गांधी मैदान, रायपुर में एक दिवसीय किसान संकल्प सम्मलेन का आयोजन किया जा रहा हैं l
इस सम्मलेन में पूरे प्रदेश से आये किसानों को देश के प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक देविंदर शर्मा, भूमि अधिकार आंदोलन के नेता और किसान सभा के राष्ट्रीय महासचिव हन्नान मोल्ला, स्वराज आंदोलन के नेता योगेन्द्र यादव व पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरविन्द नेताम संबोधित करेंगे.





पूरे देश में किसान और किसानी संकट में है और छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नहीं है, जहां एनसीआरबी के ही अनुसार हर एक लाख किसान परिवारों में 40-50 आत्महत्याएं हर साल हो रही है. छत्तीसगढ़ में भाजपा राज के 14 वर्षों में 25000 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं और इसका प्रमुख कारण लाभकारी समर्थन मूल्य न मिलना, फसल के नुकसान होने पर कोई पर्याप्त राहत न मिलना और इस कारण उनका कर्जे में डूबा रहना है. स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने से इस सरकार ने इंकार कर दिया है और इस साल बोनस की घोषणा भी मात्र 'चुनावी छलावा' है. छत्तीसगढ़ गंभीर सूखे की स्थिति से गुजर रहा है, लेकिन इसके बावजूद केंद्र सरकार ने कोई राहत नहीं दी है और राज्य सरकार किसानों और गांवों के नाम पर पूरा खजाना उद्योगपतियों और कॉर्पोरेट कंपनियों को ही लुटा रही है. मनरेगा के जरिये सूखे से लड़ा जा सकता था, लेकिन यह सरकार मनरेगा तक में ग्रामीणों को काम नहीं दे रही है, जबकि केन्द्र तो हर साल इसके बजट में ही भारी कटौती कर रहा है.

रबी मौसम में धान की फसल को पानी न देने के जरिये प्रतिबंधित करने से यह स्पष्ट है कि जल जैसी प्राकृतिक संपदा का उपयोग भी पूंजीपतियों के मुनाफे के लिए यह सरकार करना चाहती है. 5वीं अनुसूची, पेसा कानून और आदिवासी वनाधिकार कानूनों की पहले ही यहां धज्जियां उड़ाई जा रही है और 'विकास' के नाम पर जंगल व जमीन से आदिवासियों और गरीब किसानों को बिना पुनर्वास, बिना पुनर्व्यवस्थापन उजाड़ा जा रहा है. बस्तर से लेकर सरगुजा तक खनन, बांध, रेल और उद्योग से अपनी जमीन को बचाने की और विस्थापन से बचने की लड़ाई आदिवासी और ग्रामीणजन मिलकर लड़ रहे है.
यह पहला मौका नहीं है, जब भाजपा सरकार ने आदिवासियों की जमीन 'विकास' के नाम पर हड़पने के उद्देश्य से भू-राजस्व संहिता में संशोधन किया है 'सहमति' से आदिवासियों की जमीन लेने का प्रावधान किया गया है. इसके पहले भी केंद्र सरकार के ईशारे पर भूमि अधिग्रहण कानून से जुड़े नियम-कायदों को शिथिल किया गया है और वास्तव में कॉर्पोरेट घरानों के लिए भूमि की लूट को आसान बनाया है. डेढ़ साल पहले भू-राजस्व संहिता की धारा-172 में किए गए संशोधन के बाद अब गैर-योजना क्षेत्र में औद्योगिक प्रयोजन के लिए कृषि भूमि के डायवर्सन की जरूरत ही नहीं रह गई है और किसानों को चारागाह, गोठान आदि निस्तार या अन्य सरकारी जमीन भी संबंधित उद्योग/कंपनियों को देना पड़ेगा. पुनर्वास व पुनर्व्यवस्थापन के प्रावधान लागू करने के लिए निर्धारित 10 एकड़ की सीमा बढ़ाकर 1000 एकड़ कर दी गई है और इस प्रकार पुनर्वास की जिम्मेदारी से ही कार्पोरेटों को बरी कर दिया गया है. टाटा की वापसी के बाद भी बस्तर में आदिवासियों से ली गई जमीन लौटने से यह सरकार इंकार कर रही है, जबकि भू-अधिग्रहण कानून में इसका स्पष्ट प्रावधान है. यह स्पष्ट है कि किसानों के संसाधनों की लूट में भाजपा सरकार पूंजीपतियों और कार्पोरेटों के एक एजेंट की तरह काम कर रही है.


छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के बैनर तले किसानों, आदिवासियों, दलितों के बीच उनके अधिकारों के लिए काम करने वाले छोटे-बड़े सभी 25 से ज्यादा संगठन एकजुट होकर इन नीतियों के खिलाफ संघर्ष का शंखनाद करने जा रहे हैं. इस सम्मलेन में आगामी दिनों में प्रदेशव्यापी साझा आंदोलन की रूपरेखा भी तैयार की जायेगी.

Saturday, January 6, 2018

भाजपा के आदिवासी विधायकों का समाज ने हांडी फोड़ विरोध प्रदर्शन किया : देखे विडियो


भू राजस्व संहिता संशोधन विधेयक 2017 छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा पारित करने को लेकर आज आदिवासी समाज द्वारा छत्तीसगढ़ प्रदेश में प्रदर्शन हुआ ।
इसी कड़ी में कोरबा जिला में भी प्रदर्शन किया गया , यह प्रदर्शन करने का तारिका थोड़ा हट के था, आदिवासी समाज ने धरना स्थल में आदिवासी विधायको के नाम हंडी बांध दिया । जिसे उन्होंने हांडी फोट प्रदर्शन बताया ।

देखे विडियो 




आदिवासी समाज से धर्मेंद्र धुर्वे ने बताया कि हमारे समाज के जितने आदिवासी विधायक है जिन्हें प्रतिनिधित्व दिया गया है उन्होंने भू राजस्व संहिता संशोधन 2017 संविधंन के विपरीत पारित किया है, यह हांडी इस लिए टांगा गया कि समाज के लिए अब बीजेपी के आदिवासी विधायक मर गए है, उन्हें समाज से पूर्ण रूप से बहिष्कार किया जाता है। यही नही धुर्वे ने बताया कि अंत मे यह हंडियो को जो बीजेपी विधायकों के नाम से बाधा गया था फोड़ा गया।
जानकारी के अनुसार बीजेपी विधायकों का हांडी फोट के समाज द्वारा प्रदर्शन कोरबा जिला मुख्यालय और पाली ब्लाक में किया गया।
आप को बता दे कि भू राजस्व संहिता 2017 शीतकालीन सत्र में पारित किए जाने को लेकर आदिवासी समाज जंगी प्रदर्शन लगातार कर रहे है ।

भू राजस्व संहिता संशोधन- आदिवसियो ने बताया संविधान के विपरीत काला कानून, प्रदेश में हुआ जंगी प्रदर्शन, आदिवासियों के आक्रोश से सहमी सरकार

छत्तीसगढ़ भाजपा सरकार भू राजस्व संहिता अधिनियम में संशोधन कर के चौतरफा घिर गई है, आदिवासियों ने पारित भू राजस्व संशोधन विधयेक के विरोध में सडक कि लड़ाई शुरू कर दी है, आदिवासियों ने इसे संविधान के विपरीत पारित कानून बताते काला कानून बताया है . जानकारी हो कि छत्तीसगढ़ प्रदेश का 70 प्रतिशत क्षेत्र संविधान के पांचवी अनुसूची क्षेत्र अंतर्ग्रत आता है, सरकार ने आनन फानन में इस विधयेक को पारित कर अब आदिवासी समाज के निशाने पर आ गई है समाज ने सीधे सरकार को संविधान विरोधी बताते हुए संविधान का पालन न करने का आरोप लगाया है.

आज 6 जनवरी को छत्तीसगढ़ प्रदेश के लगभग सभी जिला मुख्यालयों, तहसील कार्यालयों में सर्व आदिवासी समाज के आव्हान पर एक दिवसीय धरना प्रदर्शन रैली निकाल कर आदिवासी समाज ने विरोध जताया है, खबर है कि उत्तर बस्तर कांकेर जिला मुख्यालय में भरी संख्या में आदिवासी समाज ने नेशनल हाइवे 30 जाम कर विरोध प्रदर्शन किया. प्रदेश के मुख्यमंत्री और आदिवासी मंत्रियो का पुतला दहन किया गया.
वही धमतरी जिले में लगभग 2 हजार से ज्यादा कि संख्या में आदिवासी समुदाय एकत्रित होकर पारित संशोधन का विरोध किया गया
वही कोरबा जिले में प्रदर्शन के दौरान बीजेपी मंत्रियो के विरोध करते हुए हांडी बाँध कर फोड़ा गया जो काफी चर्चा में रहा.
इसके आलवा राजधनी रायपुर, और अन्य जिलो में भी विरोध जताया गया
  
वही सरकार ने डेमेज कंट्रोल को साधने के लिए राजस्व मंत्री प्रेम प्रकाश पांडे अथवा आदिवासी मंत्री केदार कश्यप, महेश गागडा संशोधित विधयेक को लेकर प्रेस कांफ्रेस कर सफाई दी कि इस विधयेक से आदिवासियों कि जमीन को किसी प्रकार का नुकसान नही होगा. वही दूसरी और बीजेपी से आदिवासी प्रतिनिधियों ने भी इसका विरोध दबे पाँव चालु कर दिया है.
सूत्रों से खबर है कि सरकार संशोधित विधयेक को अगर जल्द वापस नही लेती है तो सर्व आदिवासी समाज राजधनी कुच कर जंगी प्रदर्शन करेगा. आदिवासी समाज के इस प्रदर्शन से सरकार बैक फुट पर है और आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों से लगातार सम्पर्क साध उन्हें मानने कि जुगत में लगे हुए है.
बस्तर संभाग के सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने बताया कि राजस्व मंत्री व तीन आदिवासी मंत्रियों द्वारा सयुंक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सफाई देते हुये बयान की कड़ी प्रतिक्रिया व्यकत की है। ठाकुर ने कहा कि ये राज्य सरकार, राजस्व मंत्री व तीन आदिवासी मंत्रियों को सर्वप्रथम भारत का संविधान के अनुच्छेद 13(3),19(5),19(6),244(1),सुप्रीम कोर्ट के फैसले समता का फैसला1997,पी रामी रेड्डी का फैसला1988,कैलाश बनाम महाराष्ट्र 2011का फैसला, कपूर बनाम तमिलनाडु 2001का फैसला का अध्ययन करना चाहिए और निर्णय करना चाहिए कि वे संविधान का पालन कर रहे हैं या संविधान के अनुसार राजद्रोह का अपराध।इसमें समुदाय के मंत्रियों की संलिप्तता बेहद गम्भीर व दुखद है। 

आदिवासी समुदाय की जमीन सहमति या असहमति से किसी भी सूरत में बिक्री असंवैधानिक है अहसत्तान्तरिय है। आदिवासी की जमीन गैर आदिवासी व्यक्ति, संस्था, राज्य सरकार व केंद्र सरकार को अहसत्तान्तरिय है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा समता का फैसला में इसकी पुस्टि कर दी है। अनुसूचित क्षेत्र में केंद्र या राज्य सरकार एक व्यक्ति के समान है जो कि गैर आदिवासी है। पी रामी रेड्डी का फैसला 1988 में निर्णय पारित कर दिया है कि अनुसूचित क्षेत्र में केंद्र व राज्य सरकार की एक इंच जमीन नहीं है। इन मंत्रियों को जानकारी होनी चाहिए कि संविधान ही सर्वोच्च है। कपूर बनाम तमिलनाडु2 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने इसकी व्याख्या कर दी है फिर कैसे तानाशाही कर संविधान विरुद्ध राजद्रोह कर रहे हैं???संविधान के अनुरूप ही कानून, विधेयक, अध्यादेश, आदेश बनाया जाता है संविधान के विपरीत नहीं।*

सर्व आदिवासी समाज की यह मांग है कि राज्य सरकार सर्व प्रथम इन मंत्रियों की पैतृक व भारी मात्रा में गरीब आदिवासियों की जमीन को खरीदी गई जमीनों का इन मंत्रियों की सहमति से तीन नहीं हजार गुना दर पर पूरी जमीन खरीदी कर लें । जो प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे वे पहले सम्पूर्ण जमीन राज्य सरकार को बेच दें।साथ ही उन विधायकों की जमीन भी खरीदी कर ले जो सदन में इस विधेयक के पक्ष में मतदान किये हैं। इनको समाज बेनकाब करेगी। सर्व आदिवासी समाज यह घोषणा करती है कि समुदाय की एक इंच जमीन किसी भी गैर आदिवासी को नहीं बेचेगी और संविधान व सुप्रीम कोर्ट की सम्मान करती है। पक्ष में मतदान करने वाले विधायकों की पूरी जमीन सरकार तत्काल सहमति से खरीदे तब तो उनकी मतदान करना सही है।* सरकार व राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्र के विधिक पारम्परिक ग्रामसभाओं द्वारा पारित असंवैधानिक विधेयक को तुरंत निरस्त करने के लिए पूरे राज्य से 5 हजार से अधिक ग्रामसभा का आदेश जारी हो चुके हैं फिर भी राज्य सरकार संविधान विरुद्ध कार्य पर आमादा है। आगामी दिनों में पारंपरिक ग्रामसभाओं के द्वारा राज्य सरकार के द्वारा संविधान की अवमानना उलंघन करने के एवज में उच्चतम न्यायालय में राजद्रोह का मुकदमा दर्ज की जायेगी तथा इन तीन आदिवासी मंत्रियों के खिलाफ समुदाय विरोधी कार्य की जोरदार असरदार दमदार सबक कार्यवाही की जाएगी ये वही मंत्री हैं जो इतने दिनों से समाज विरोध दर्ज कर रही है तो समाज मे आकर चर्चा करना छोड़ वहाँ असंवैधानिक सफ़ाई दे रहे हैं इनकी समुदाय की स्वाभिमान खत्म हो गई है। सरकार विकास करने के एवज में जमीन लेने की बात कर रही है यह कोरा झूठ है।रायगढ़, सरगुजा, कोरिया, नगरनार, बैलाडीला, लोहण्डीगुड़ा से साफ हो गई है कि आदिवासी का विकास नहीं हुआ सिर्फ विनाश हुआ है। विकास तो सिर्फ पूंजीपतियों की हुई है ऐसा विकास का समाज पुरजोर संवैधानिक विरोध दर्ज कर अवैध करार देती है।