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मंगलवार, 29 नवंबर 2016

फर्जी मुठभेड़ कर मौत के घाट उतारा जा रहा

ग्रामीण आदिवासी तेंदुपत्ता का बोनस मांगने जाए तो नक्सली ? मनरेगा का मजदूरी मांगने जाए तो नक्सली? धान का समर्थन मूल्य बढ़ाने की मांग करे तो नक्सली? वनोपज चार-महुवा का मूल्य बढ़ाने की मांग करे तो नक्सली? जमीन छिनने का विरोध करे तो नक्सली? बांध बनाने के लिए विरोध करे तो नक्सली? पेड़ो को कटाने का विरोध करे तो नक्सली? जंगल में लकड़ी बीनने जाए तो नक्सली? जानवर चाराने जाए तो नक्सली? रोड का मांग करे तो नक्सली? स्कूल मांगने जाए तो नक्सली? पुलिस जबरिया आत्म समर्पण कराए ग्रामीण विरोध कर दिए तो नक्सली? फर्जी गिरफ्तार का विरोध करे तो नक्सली? किसी बेगुनाह को मार दिए उसका भी विरोध करे तो नक्सली? हाल ही में नोट बंदी का नया चोचला में नोट बदलवाने जाए तो नक्सली? ग्रामीण शौक में मोबाईल  रख लिए तो नक्सली?

रमन सिंह की सरकार और उनके पुलिस के आला अफसरों और भाजपा के स्वघोषित राष्ट्र भक्तो को ये सब नक्सली बहकावे में आकार किया जाता है ऐसा लगता है ? इन सब चीजो को मांग ग्रामीण नही कर सकते? ग्रामीण विरोध नही कर सकते?
माननीय रमन सिंह जी सब में ही आपकी पुलिस नक्सली जोड़ देती है, क्या अब ग्रामीण आदिवासी लोकतन्त्र पर विश्वास कर विरोध प्रकट करते है, अपने संवेधानिक अधिकारों की मांग करते है, अपने महान प्राक्रतिक संसकृतिक विरासत को जिन्दा रखना चाहते है, अपने जमीनों की रक्षा करना चाहते है, जंगलो, पहाडो नदियों से प्यार करते है उनके दोहन का विरोध करते है तो सब नक्सली हो गए? या नक्सलियों के इशारे में करते है ? आप सारे आदिवासियों को नक्सली बताने या बनाने में क्यों तुले है रमन सिंह जी ? आपकी पुलिस की बर्बर रवये के चलते आप नक्सलवाद को जन्म दे रहे हो ?  

कोंडागांव में हुए फर्जी मुठभेड़ को भी एस पी अथवा आला पुलिसके लोगो ने नक्सलियों के इशारे पर बता दिया ?


हर मुठभेड़ को फर्जी बताते हैं नक्सली-एसपी
कोंडागांव एसपी संतोष सिंह ने इस मामले में कहा कि मृतक नक्सली था। घटना की रात वह एलओएस कमांडर सहित तीन नक्सली साथियों के साथ जंगल में घूम रहा था व मुठभेड़ में मारा गया। उसके परिजन शव लेने आए थे तो बताया था कि वह नक्सल संगठन में रहता था व घर कभी कभार ही आता था। पुलिस जो भी इनकाउंटर करती है, उसे नक्सलियों के इशारे पर फर्जी बता दिया जाता है।
-महेश्वर नाग, एएसपी कोंडागांव
ग्रामीण माओवादियों के बहकावे में आकर इस तरह का प्रदर्शन कर रहे है। लगभग हर मुठभेड़ के बाद जब कोई नक्सली मारा जाता है तो वे ग्रामीणों को भड़काकर प्रदर्शन करवाते हैं।'


कोण्डागांव  !   जिला के अतिसंवेदनशील क्षेत्र में बसे ग्राम मर्दापाल में स्थापित पुलिस थाना के समीप ग्राम छोटे कोडेर के ग्रामीणजनों द्वारा शव को जिला मुख्यालय ले जाने के प्रयास वाली घटना की जानकारी मिलने के बाद मौके पर पहुंचे कोण्डागांव विधायक मोहन मरकाम ने वहां हुए समस्त वाकया से रूबरू होने के बाद प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अपने वक्तव्य कुछ इस तरह प्रकट किए। बस्तर संभाग में लगातार फर्जी नक्सली मुठभेड़ की शिकायतें मिल रही है, अगर इस मुद्दे पर कोई कुछ कहता है तो उसे नक्सली समर्थक कहा जाता है, चाहे वह जनप्रतिनिधि हो, पत्रकार हो या फिर सामाजिक कार्यकर्ता हो। जबकि हम कभी भी नक्सली समर्थक नहीं रहे हैं, मगर बेगुनाह लोगों की हत्या भी नहीं सहेंगे, कुछ जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के इशारे पर पुलिस वाहवाही लूटने के लिए फर्जी मुठभेड़ कर रही है। ऐसी ही एक घटना कोण्डागांव जिले के मर्दापाल क्षेत्र में घटित हुई जहां बालसिंह पिता रामधर को नक्सली पुलिस मुठभेड में मारा जाना बताया गया, जिसे उनके परिजनों ने फर्जी बताते हुए पुलिस द्वारा हत्या किया जाना बताया गया। इस घटना के चलते ग्रामीणों एवं पीडि़त परिवार द्वारा मर्दापाल थाना में एफ.आई.आर.दर्ज कराने का आवेदन दिया, मगर एफआईआर दर्ज करने से थाना प्रभारी द्वारा मनाकर दिया गया। जिसके कारण ग्रामीण थाने के सामने इकठ्ठा हो गए। घटना की सूचना कोण्डागांव के विधायक मोहन मरकाम को मिली। उनके द्वारा पीडि़त परिवार एवं ग्रामीणों से मिलने मर्दापाल गए तो मर्दापाल पुलिस द्वारा यह जानकारी दी गई कि मर्दापाल थाना क्षेत्र अंतर्गत बावड़ी के जंगल में जो घटना घटित हुई उसमें बालसिंह पिता रामधर का नक्सली मुठभेड़ में मुत्यु होना बताया गया। घटना के बारे में उस क्षेत्र के ग्रामीणों तथा जनप्रतिनिधियों नेे मुझे यह बताया कि उक्त घटना नक्सली मुठभेड़ नहीं था, इसमें 2 व्यक्ति मनारू पिता झगडु ग्राम नाहकानार एवं मेघनाथ पिता गुदड़ी ग्राम एहकेली द्वारा बालसिंह पिता रामधर छोटेकोड़ेर ग्राम पंचायत लखापुरी को 24 नवम्बर दिन गुरूवार की रात में करीब 9 बजे बालसिंह की पत्नी श्रीमती कचरीबाई के सामने ही उनके घर से उठाकर ले जाया गया था और जाते जाते कहा गया था कि कल इसको छोड़ देंगे। कचरीबाई उक्त दोनों व्यक्तियों को पहचानती है। पुलिस द्वारा 27 नवम्बर 2016 को बालसिंह का शव पोस्टमार्टम करने के बाद ग्रामीणों के सामने उनके परिवारजनों को सुर्पद किया। नक्सल विरोधी अभियान के तहत बस्तर में पुलिस प्रशासन द्वारा निर्दोष बस्तरवासियों को नक्सली बताकर फर्जी मुठभेड़ का मामला बनाकर मौत के घाट उतार रही है। बस्तर के अतिसंवेदनशील क्षेत्रों जहां ग्रामीण कष्टप्रद जीवन जी रहे हैं, जिम्मेदार अधिकारी के निर्देशों पर नक्सली प्रकरणों में जो उनके निर्देशों का पालन नहीं करते, उन्हें प्रताडि़त कर नक्सली प्रकरण में घसीटा जाता है व मौत के घाट उतारा जा रहा है। बालसिंह पिता रामधर के बारे में तहकीकात किए जाने पर पता चला कि उसे पहले भी पुलिस द्वारा नक्सली मामले में फंसाकर जेल भेज दिया गया था, किन्तु वह जुलाई 2016 में सभी धाराओं से विमुक्त हो चुका था व उसे न्यायालय द्वारा मुक्त किया गया था और वह परिवार के साथ शांतिपूर्ण ढंग से जीवनयापन कर रहा था। इसी प्रकार कुछ दिनों पूर्व में रज्जू कोर्राम पिता सैनु कोर्राम निवासी बेचा को नक्सली बता कर फर्जी मुठभेड़ में मारा जाना बताया गया था, जबकि मर्दापाल में रज्जू कोर्राम का भाई पढ़ता था, जिसके लिए वह चांवल छोडने गया था और गोलावंड के एकलव्य विद्यालय में 6 वीं कक्षा में पढने वाले अपने छोटे भाई के साथ वापस अपने गांव बेचा जा रहा था।
कौन नहीं चाहता कि बस्तर में नक्सलवाद समाप्त हो, लेकिन यहां तो जिम्मेदार अधिकारी के नेतृत्व में पुलिस आदिवासियोंं को समाप्त करने में लगी है। अपने पद में वृद्धि के लालच में पुलिस वाले बेगुनाह आदिवासियों की हत्या नक्सलियों के नाम पर करवा रहे हैं।
अगर किसी भी गांव में नक्सली प्रकरण है, किसी के विरूद्ध अपराध पंजीबद्ध है, तो उसका नाम पहले सार्वजनिक करना चाहिए ताकि ग्रामीणजन भी जान सकें कि फलां व्यक्ति नक्सली गतिविधियों में शामिल है।
 बेगुनाह लोगों की हत्या करने के बाद उसको इनामी नक्सली घोषित किया जाता है। बालसिंह पिता रामधर के हत्यारों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए एवं उनके परिवार को आर्थिक सहायता के रूप में 20 लाख रूपये एवं उनकी पत्नी को शासन शासकीय नौकरी दे।

रविवार, 27 नवंबर 2016

नक्सली रकम समझ पुलिस ने कर ली जब्त, ग्रामीण बैंक ही नहीं जा रहे


ग्रामीण भयभीत| बैंक में रकम जमा करने जाते हैं तो पुलिस पूछताछ करती है 
भास्कर न्यूज | बड़गांव


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500-1000 के नोटबंदी के बाद अंचल में सबसे ज्यादा परेशानी अंदरूनी इलाके में रहने वाले ग्रामीणों को हो रही है। प्रशासन ने नक्सलियों के रकम को बैंकों तक जाने से रोकने के लिए सुरक्षा बढ़ा दी है। हर चौक-चौराहों पर बीएसएफ व जिला पुलिस गाड़ियों के साथ रखे सामान की भी जांच कर रही है। वहीं इससे ग्रामीणों में रकम जमा करने को लेकर संशय उत्पन्न हो गया है। 

आदिवासियों ने कहा कि सालों से वनोपज से तेंदूपत्ता, महुआ, टोरा बेचकर 50 हजार से ज्यादा रकम जमा कर रखे हैं। पैसा लेकर बैंक में जमा करने जाते हैं तो पुलिस नक्सलियों का पैसा बोलकर पूछताछ करती है। आदिवासी अपनी बात सही ढंग से नहीं रख पाने के कारण शंका के दायरे में ना आ जाए यह सोच कर बैंक नहीं जा रहे हैं। पुलिस इस बारे में बहुत बारीकी से जांच कर वास्तविक हालात को देख रही है लेकिन आदिवासी किसी पचड़े में पड़ना नहीं चाहते। नाम नहीं छापने की शर्त पर लोगों ने बताया नोट बंदी से निश्चित रूप से नक्सलियों की कमर टूटी है। वहीं हमारे पास अपनी मेहनत का कमाया हुआ पैसा है। अगर हम इसे बैंक में जमा कराने जाते हैं तो पुलिस इस पैसे को नक्सलियों का समझकर दुनिया भर की पूछताछ करेगी। 

ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश के पास खाता नहीं 
आदिवासी बैंकों के चक्कर काटने से बचने के लिए पारंपरिक तरीके से ही बचत करने पर विश्वास करते हैं। अधिकांश लोगों के बैंक खाते नहीं है। वे अपने घरों में ही पैसा जमा कर रखे हुए हैं। ऐसे लोगों के सामने नोटबंदी ने समस्या खड़ी कर दी है। 
परलकोट के जनधन खातों में जमा हुआ 1 करोड़ 
परलकोट क्षेत्र के पखांजुर, कापसी, बांदे के बैंकों में जनधन खाते खुलवाए गए हैं। नोटबंदी के बाद इन खातों में 1 करोड़ से अधिक की राशि जमा हुई है। अब यह सवाल भी उठने लगा है कि इस राशि में कैसे फर्क किया जाएगा कि पैसा नक्सलियों का है या ग्रामीणों की मेहनत का। 
घबराने की जरूरत नहीं, जांच में स्थिति स्पष्ट करें 
ग्रामीणों को डरने और घबराने की जरूरत नहीं है। वे अपनी मेहनत की कमाई बैंक में जमा करने स्वतंत्र हैं। यदि बड़ी रकम लेकर बैंक जा रहे हैं तो पुलिस जांच में स्थिति स्पष्ट करें। पुलिस सहयोग करेगी। शम्मी आबिदी, कलेक्टर कांकेर 
नक्सलियों का कालाधन पकड़ने पुलिस व बीएसएफ कर रही जांच। 
यह खबर दैनिक भास्कर कांकेर के आंचलिक बडगांव से साभार है