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गुरुवार, 16 नवंबर 2017

तमनार ब्लॉक में कोयला खदानों और थर्मल पावर प्लांट से लोगो की जिन्दगी खतरे में..पीपुल्स फर्स्ट कलेक्टिव के मेडिकल रिपोर्ट से खुलासा.

रायपुर:-पीपुल्स फर्स्ट कलेक्टिव के मेडिकल और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा आयोजित एक स्वास्थ्य अध्ययन में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के तमनारब्लॉक में कोयला खदानों और थर्मल पावर प्लांटों के आसपास रहने वाले निवासियों के बीच गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं देखी गई हैं  राजधानी रायपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस में समिति  के सदस्य रिंचिन, डॉ मनन गांगुली, डॉ समरजीत जाना ने गुरुवार को पत्रकारवार्ता में इसका खुलासा करते हुए एक रिपोर्ट प्रस्तुत किया गया। रिपोर्ट के अनुसार बिजली
संयंत्रों और कोयला खानों के 2 किलोमीटर के प्रभावक्षेत्र के भीतर आने वाले तामनार ब्लॉक के 3 गांवों में 500 से अधिक लोगों का सर्वेक्षण किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक इस अध्ययन में प्रतिभागियों के बीच पहचाने जाने वाली स्वास्थ्य संबंधी शिकायतें काफी अधिक है।निवासियों के बीच दस सबसे प्रचलित गंभीर स्वास्थ्य स्थितियों में बालों के झड़ने और कमजोर बाल ; मॉस पेशियों और जोड़ों का दर्द, शरीर और पीठ में दर्द; शुष्क, खुजली और त्वचा के रंग का उतरना और पैर के तलवे का फटना ; और सूखी खाँसी की शिकायतें शामिल है।

स्वास्थ्य और रसायन विशेषज्ञों द्वारा कोसमपाली, डोंगामहुआ, कोडकेल, कुंजेमुरा और रेहगांव गांवों में हवा, पानी, मिट्टी और तलछट में रसायन की उपस्थिति की जांच की गई। इनके निवासियों द्वारा कोयला खानों, तापीय बिजली संयंत्रों और कोयला राख तालाबों से गंभीर प्रदूषण और स्वास्थ्य समस्या की शिकायतों पर यह जांच की गई थी.

आप को बता दे कि तमनार के इन गांवों में हवा में प्रदूषण का स्तर बेहद खतरनाक स्थिति में पहुंच गया है और असंयमित दोहन से तमनार के इन गांवों में भूजल स्तर में भी तेज गिरावट आई है और यह सब पूर्व में कोयला खनन कर रही जिंदल एवं वर्तमान में एसईसीएल के कारण हुआ है। ग्रामीणों ने एनजीटी एवं कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए पर्यावरण विभाग पर कुछ नहीं करने का आरोप लगातार लगते रहा है । 

गौरतलब हो कि पिछले पांच वर्षो के अंतराल मे रायगढ़ जिले में 100 से ज्यादा फैक्टरियां कारखाने और कोयले खदाने जिस गति से संचालित हुई उससे कहीं अधिक इससे उत्पन्न प्रदूषण है। स्पंज आयरन फैक्ट्ररियों के अलावे कोयला आधारित पावर प्लांटो में अनगिनत वृद्धि हुई। रायगढ़ के संचालित के साथ-साथ तमनार में संचालित बड़े कारखानों व खदानों ने नियम की धज्जियां उड़ाते हुये पर्यावरण को दूषित करने कोई कसर नहीं छोड़ी। रागयढ़ जिले मे औद्योगिक विस्तार के कारण यातायात का दबाव बड़ गया है जिसके चलते तमनार क्षेत्र में सड़क परिवहन से कारखानों मे कच्चा माल सप्लाई करने के कारण सड़के व्यस्त हो गयी है। वहीं औद्योगिक दुर्घटनाओ के साथ-साथ सड़क दुर्घटनाओं मे दिनों दिन वृद्धि हो रही है। वायु एवं जल प्रदूषण के कारण जहां लोग खांसी एवं दमा जैसे गंभीर बीमारियों के चपेट में है। 

रिपोर्ट के मुताबिक इसके अलावा अध्ययन के निष्कर्षों के मुताबिक, “महिलाओं ने मुख्य रूप से कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का अनुभव किया था, जिनमें से सूखी खांसी (77%), बालों के झड़ने (76%) और मॉस पेशियों / जोड़ों का दर्द (68%) सबसे प्रचलित थे।रिपोर्ट से यह पता चलता है कि उनके अनुसंधान के दौरान यह पाया गया कि हवा, पानी, मिट्टी और तलछट में पाए जाने वाले जहरीले पदार्थों के खतरनाक स्तरों के संपर्क में आने का,आसपास में स्थित
निवासियों द्वारा अनुभव किये जा रहे गंभीर स्वास्थ समस्याओं से जुड़े होने की संभावना है

अध्ययन के प्रमुख जांचकर्ताओं में से एक डॉ. मननगांगुली के अनुसार, “इस अध्ययन के निष्कर्ष महत्वपूर्ण हैं जिसके लिए तत्काल उपायों का करना ज़रूरी है। रिपोर्ट बताती है कि छत्तीसगढ़ के रायगढ़ क्षेत्र में पीढ़ियों से रहने वाले लोगों पर बड़े पैमाने पर खनन, कोयला आधारित बिजली संयंत्र और अन्य उद्योगों ने स्थायी नकारात्मक प्रभाव डाल दिए हैं।
इन सबके चलते, उनके पर्यावरण, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के साथ गंभीर रूप से समझौता किया गया है।

 डॉक्टर समरजीत जाना के अनुसार, जिन्होनें अध्ययन के लिए चिकित्सा शिविर का नेतृत्व किया था, “खनन और बिजली संयंत्रों के पड़ोस में रहते हुए बहुत कम स्थानीय निवासियों का स्वास्थ्य अच्छा है। हमने वहां के निवासियों में कई स्वास्थ्य शिकायतों को देखा है, और चिकित्सकीय रूप से यह विषाक्त पदार्थों के लोगों को जोखिम पहुँचाने के एक से अधिक तरीके को इंगित करता है। हमने एक से अधिक परिवार के सदस्य को एक जैसी स्वास्थ्य शिकायतों का सामना करते हुए देखा। युवा उम्र के लोगों में मांस पेशी सम्बंधित स्वाथ्य की शिकायतों के उच्च स्तर का होना काफी चौंकाने वाला खुलासा था। हमें सूखी खासीं की शिकायतें काफी मिली न की उत्पादक खाँसी की जो की इस बात की और संकेत देती है की लोगों में यह सारे लक्षण एलर्जी से हो रहे हैं न की रोगजनक (pathogens) से ।ये स्वास्थ्य लक्षण, इस क्षेत्र में जल, वायु और मिट्टी के पर्यावरणीय नमूने में पाए जाने वाले जहरीले रसायनों के प्रभाव की पुष्टि करते हैं ।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि किडनी से संबंधित स्वास्थ्य समस्याएं और मधुमेह की बार-बार शिकायतें की गई”, लेकिन देनिक जानकारी को साबित करने के अभाव में, पर्याप्त रूप से इसका पता लगाया नहीं जा सका। इसी तरह मानसिक बीमारी और विकलांगता से संबंधित निष्कर्ष, जो की लोगों में काफी दिखाई दी और मेडिकल टीम के एक मनोचिकित्सक द्वारा लोगों में उसके होने की पुष्टि भी की गयी, का भी समय और संसाधन बाधाओं के कारण पूरी तरह से जांच नहीं की गई थी। इसके अलावा रिपोर्ट में कहा गया है, “टीबी के 12 मामलों की पहचान सरसमाल के 341 लोगों से बातचीत करके सामने आये, जिन्होनें वर्तमान में या हाल ही में अपना इलाज पूरा करा । इस बीमारी का इतना अधिक लोगों में होना इस बात के और संकेत करता है कि पर्यावरणीय कारणों से टीबी और / या सिलिकोसिस की और भी अधिक मामले होंगे जिसकी की जांच होनी चाहिए।

रिपोर्ट में यह भी मांग की गयी है की जब तक खदानों और बिजली संयंत्रों की व्यापक स्वास्थ्य प्रभाव आकलन पूरा नहीं हो जाता और उनकी सिफारिशें लागू नहीं की जाती हैं तब तक मौजूदा खदानों के विस्तार और नई कोयला खदानों की स्थापना पर रोक लगाया जाये। यह राज्य और केंद्रीय एजेंसियों को कोयला खानों और कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के आसपास के समुदायों में प्रदूषण की प्रकृति और सीमा की पहचान करने के लिए अधिक गहराई से अध्ययन करने और स्वच्छ उपायों, हवा, मिट्टी और जल ( सतह और भूमिगत) स्रोतों को संचालित करने के लिए कहता है । अध्ययन में यह भी कहा गया है कि कोयला खदानों और कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के 5 किलोमीटर के अंतर्गत रहने वाले लोगों की उचित स्वास्थ्य देखभाल और निशुल्क विशेष उपचार को तत्काल उपलब्ध कराया जाये .

पर्यावरण नमूने के परिणामों के बारे में: इस साल अगस्त में चेन्नई स्थित सामुदायिक पर्यावरण मॉनिटरिंग ने छत्तीसगढ़ के रायगढ़ के तमनार और घरघोडा के ब्लॉक में कोयला खदानों, थर्मल पावर प्लांट्स और ऐश पॉन्ड्स के आसपास पर्यावरण नमूनाकरण पर रिपोर्टनामक एक अध्ययन जारी किया था।

अध्ययन के अनुसार, इस क्षेत्र के चारों ओर पानी, मिट्टी और तलछट के नमूने में एल्यूमिनियम, आर्सेनिक, एंटीमनी, बोरान, कैडमियम, क्रोमियम, लीड, मैग्नीज, निकेल, सेलेनियम, जिंक और वैनडियम सहित कुल 12 विषैली धातुएं मिलीं।

12 विषाक्त धातुओं में से 2, कार्सिनोजेन हैं और 2 संभावित कार्सिनोगेंस हैं। आर्सेनिक और कैडमियम जाना माना कार्सिनोजेन्स है और लीड और निकेल संभवतः कार्सिनोजेन्स हैं।


कई सारी यह धातुएं, सांस की बीमारियां, सांस में कमी आना, फेफड़ों की क्षति, प्रजनन क्षति, जिगर और गुर्दा की क्षति, त्वचा पर चकत्ते, बालों के झड़ने, भंगुर हड्डियां, मतली, उल्टी, दस्त, पेट दर्द, मांसपेशियों और जोड़ों के दर्द और कमजोरी आदि का कारण होता है


साभार पीपुल्स फर्स्ट कलेक्टिव के स्वास्थ्य अध्ययन समिति के सदस्य रिंचिन, डॉ मनन गांगुली, डॉ समरजीत जाना  की प्रेस विज्ञप्ति और रिपोर्ट के आधार पर 

एक तरफ CM रमन सिंह की बहू को VIP ट्रीटमेंट, दूसरी तरफ गरीब गर्भवती महिला को मिला ये.

छत्तीसगढ़- गर्भाशय कांड, नसबंदी कांड, आंख फोड़वा कांड के नाम से स्वास्थ्य सुविधाओं में   बदनाम छत्तीसगढ़ की बीजेपी सरकार के दामन में एक और दाग लग गया है। आप को बता दे कि  छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह  की पोती का जन्म रायपुर के सबसे बड़ी सरकारी अस्पताल डॉ भीमराव अंबेडकर मेमोरियल में हुआ. 11 नवंबर को उनके  बेटे अभिषेक की पत्नी ऐश्वर्या ने अस्पताल में बिटिया को जन्म दिया, जिसके लिये पूरे देश भर में तस्वीरें वायरल हुई रमन सिंह को बधाई मिली लेकिन जिस सरकारी अस्पताल में सीएम की बहू को प्रसूति के वक्‍त वीआईपी ट्रीटमेंट मिला. उसी वक्त सामान्य और गरीब परिवार की गर्भवती महिलाओं को बिस्तर साझा करना पड़ा. यही नहीं अस्पताल के बीमार डॉक्टरों के कमरे को भी पुलिस कंट्रोल रूम में तब्दील कर दिया गया.
 गौरतलब हो  कि अंबडेकर अस्पताल के प्रसूति कक्ष में ऑपरेशन से डिलेवरी हुई महिलाओं को एक ही बिस्तर पर दो महिलाओं को रखा जा रहा है जहां इंफेक्शन फैलने की पूरी संभावना है। इस अस्पताल का वार्ड नम्बर 2 पर समारिन देवांगन और दुर्गावती फ़रिहार पिछले 2 दिनों से इस अस्पताल में दुर्गा और समरीन भर्ती है और ये दोनों गर्भवती महिलाएं अस्पताल के एक ही बेड पर एडमिट है। बात सिर्फ दुर्गा और समरीन की नही है बल्कि इनकी तरह आरती ,खोनी बाई, निशा परवीन ,चन्दा वर्मा क्रांति चौहान दुर्गा संघारे जैसी सैकड़ो महिलाओं की यही परिस्तिथि है। जिन गर्भवती महिलाओं को बड़ी हि सावधानी औऱ सुरक्षा के साथ अस्पताल में चिकित्सा सुविधाएं मिलनी चाहिए वो एक दूसरे के गर्भ पर पैर रखे हुए पड़ी है। आलम यह है की बिस्तर तो दूर गर्भवती महिलाओं को कड़ाके की ठंड में नीचे भी सोना पड़ रहा है।

आप को बता दे कि मुख्यमंत्री ने अपनी बहू की डिवीलेरी किसी बड़े थ्री या फाइव स्टार अस्पताल में करवाने की बजाय एक सामान्य से सरकारी अस्पताल में करवाकर लोगो के बीच यह संदेश देने की कोशिश की है वे भलेही राज्य के मुख्यमंत्री हो लेकिन वो भी आम आदमी की तरह ही अपने बहु की डिलीवरी एक सरकारी अस्पताल में करवा रहे है। प्रदेश में सरकारी स्वास्थ्य सेवा के बदहाली जगज़ाहिर है। लोग सरकारी अस्पतालों में जाने से कतराते हैं जिसके चलते निजी अस्पतालों में इलाज कराना बेहतर समझते है।  तो वही अम्बेडकर अस्पताल प्रशासन अपने सफाई में कह रहे है कि राज्य के मुख्यमंत्री जी सरकारी अस्पताल को चुना है। हालांकि उन्होंने कहा कि 700 मरीजों इंफ्रास्ट्रक्चर में 1200 मरीज भर्ती है।

@ 2014 में बिलासपुर में निजी अस्पताल में शिविर लगाकर नसबंदी किये जाने के दूसरे ही दिन मौत का सिलसिला शुरू हो गया था। जिसमे 18 लोगो की जान चली गई थी। डॉक्टरों ने टारगेट पूरा करने के चलते एक दिन में 83 ऑपरेशन कर डाले थे जबकि 40 ऑपरेशन के टारगेट रहता है।  @ 2012 में गर्भाशय कांड की शुरुवात हुई जहाँ निजी नर्सिंग संचालको ने ग्रीवा कैंसर का भय दिखाकर गर्भशाय निकाल लेने का मामला सामने आया था। छत्तीसगढ़ विधान सभा मे जुलाई 2013 में एक प्रश्न के लिखित जवाब में बताया कि वर्ष 2010 से 13 के बीच 1800 गर्भशाय निकालने के मामले सामने आए।  @ 2011 में सरकारी लापरवाही के चलते बालोद जिले में 48 लोगो की आंखों की रौशनी चली गई। यही नही बागबाहरा में 12 राजनांदगांव-कवर्धा में 4-5 लोगो की आंखों की रौशनी चली गई। इसके उपरांत अनेको मामले सामने आते रहे जिसे आंख फोड़वा कांड कहा गया।

इन घटनाओं से भी राज्य की सरकार और सरकारी महकमा सबक नही ले रहा है और सरकारी स्वास्थ्य लापरवाही लगातार सामने आ रहे है। वही सवाल उठने लगे है कि एक ओर प्रदेश के मुखिया की बहू का वीआईपी ट्रीटमेंट तो दूसरी ओर अन्य महिलाओं को बिस्तर तक नसीब नही है? छत्तीसगढ़ प्रदेश का सरकारी अस्पतालों में शुमार अम्बेडकर अस्पताल की यह स्थिति अपने आप मे बखान कर रही है। प्रदेश में स्वास्थ्य सेवा का अंदाजा लगाया जा सकता है।

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

कांकेर एसडीएम भारती चन्द्राकर ने कहा जनप्रतिनिधि और नगरवासियों को जेल में डलवा दूंगी, बीजेपी नगर पंचायत अध्यक्ष का आरोप

कांकेर:- कांकेर एसडीएम आई पुरे प्रशासनिक तेवर में जनप्रतिनिधियों सहित गांवो वालो को जेल में डाल देने की दे डाली धमकी, लेकिन भाजपा नगर पंचायत अध्यक्ष को अब भी बीजेपी शासन पर है पूरा भरोसा लेकिन प्रशासन पर नही?

“आपके चुनावी घोषणा पत्र में जमीन बांटना लिखा है, आप जनप्रतिनिधियों के साथ पुरे गाँव वासी को जेल में डाल देंगे” जी हा कांकेर एसडीएम भारती चन्द्राकर ने कांकेर जिला अंतर्ग्रत नरहरपुर ब्लाक के भाजपा नगर पंचायत अध्यक्ष भोपेश नेताम को प्रशासनिक अंदाज में यही कह डाला!

नगर पंचायत अध्यक्ष भोपेश नेताम का आरोप है कि प्रशासन के पास जा-जा के जूते घिस डाले लेकिन प्रशासन बाते नही सुनती, आगे वो कहते है उनका बीजेपी से कोई भरोसा नही उठा, प्रशासन से भरोसा उठ गया है.

·        आप को बता दे कि कांकेर एसडीएम भारती चंद्राकर इससे पहले कांकेर जिले अन्तर्गत पखांजूर में बतौर एसडीएम थी और हो रहे जमीं के अवैध कब्जा पर लगातार कार्यवाही कर रही थी,
·        जानकारों के अनुसार इसी कार्यवाही के चलते उनका तबादला कांकेर में किया गया है. चर्चा यह भी है कि कांकेर कलेक्टर से आपसी सामंजस्य बैठने के चलते प्रशासनिक कार्यो में काफी गहमा-गहमी रहती है.

गौरतलब हो कि भाजपा सरकार में प्रशासनिक अफसरों के हमेशा बिगड़ते बोल से सरकार सुर्खियों में रही है, इससे पहले कई दफे अफसरों ने सरकार की नाकामयाबी के पोल खोले है. तो वही प्रशासनिक अमले के ऊपर निरीह लोगो को प्रताड़ित करने के आरोप लगते रहे है. समय-समय पर अखबारों में सुर्खिया रहती है प्रदेश में प्रशासनिक अमला हावी है, जनप्रतिनिधियों के साथ दुर्व्यवहार की लगातार घटनाए सामने आते रहती है, नगर पंचायत अध्यक्ष भोपेश नेताम कहते है ऐसे अधिकारियों के कारण ही सरकार बदनाम होती है दो-चार अधिकारियो के गलत रवेय्ये के चलते ही सरकार की प्रशासनिक सिस्टम मे सवाल खड़े होते है.

क्या है पूरा मामला

जानकारी के अनुसार नरहरपुर ब्लाक में 10 साल पहले सामाजिक भवन निर्माण के लिए प्रस्तावित है वही शासन की ओर से नरहरपुर के धमतरी रोड पर शासकीय जमीन पर करोड़ों की लागत से हाउसिंग बोर्ड कालोनी को बनाया जाना प्रस्तावित है। इस जगह पर पहले से नगर के कलार समाज के अलावा पांच अन्य समाज के लोगों की ओर से सामाजिक भवन बनाने के लिए प्रस्तावित स्थल बोर्ड लगाकर रखा गया था। एजेंसी ने काम शुरू कराने के साथ ही वहां समाज की ओर से लगाए गए बोर्ड को उखड़वा दिया। बोर्ड उखड़ते ही विरोध के स्वर उठने लगे। सामाजिक लोगों जनप्रतिनिधियों ने रातों-रात बैठक कर इसका विरोध करने का निर्णय लिया।
13 नवम्बर को प्रशासन अथवा एसडीएम भारती चन्द्राकर नरहरपुर पहुचे जहा एसडीएम ने जनप्रतिनिधि अथवा नगरवासियों को जेल में डाल देने की बात कही, आक्रोशित जनप्रतिनिधियों और नगरवासियों ने प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया 14 नवम्बर को ब्लाक नरहरपुर बंद कराते प्रदर्शन और चक्का जाम कर दिया गया, 14 नवम्बर को ही दोपहर दो बजे एसडीएम भारती चंद्राकर एवं अपर कलेक्टर आरआर ठाकुर धरना स्थल पहुंचे। उन्होंने सामाजिक भवन के लिए 60 डिसमिल भूमि देने तहसीलदार एवं पटवारी को सीमांकन करने कहा। इस पर चक्काजाम खत्म हुआ। 
आप को बता दे कि ब्लाक नरहरपुर में  दस साल पहले कलार समाज के अलावा अन्य पांच समाजों द्वारा सामाजिक भवन निर्माण के लिए भूमि चिह्नांकित कर रखी गई थी। नगर पंचायत अध्यक्ष भोपेश नेताम का आरोप है कि  निर्माण के लिए नगर पंचायत से किसी प्रकार का एनओसी तक नहीं लिया गया है। प्रशासन नगर पंचायत के साथ भेदभाव करता है तथा पूछना तक उचित नहीं समझता।
इस मामले में कांकेर एसडीएम भारती चंद्राकर से फोन पर उनका पक्ष जानना चाहा तो उन्होंने फोन नही उठाया. फिलहाल प्रशासन की ओर से समाज को आबंटित जमीन में क़ानूनी त्रुटिया का हवाला दिया जा रहा है. 

रविवार, 5 नवंबर 2017

पीयूसीएल की रिपोर्ट पर राष्ट्रिय मानव अधिकार आयोग ने छत्तीसगढ़ सरकार को किया नोटिस जारी, मुख्य सचिव से मांगा जवाब

पीयूसीएल की ओर से राष्ट्रिय मानव अधिकार दी गई जांच रिपोर्टस में छत्तीसगढ़ सरकार को राष्ट्रिय मानव अधिकार आयोग ने बिंदुओं पर महीने के भीतर जवाब देने को कहा है. आप को बता दे कि वर्ष 2007 में कोंडासवालीकामरागुडा और कर्रेपारा में सलवा जुडूम अभियान के दौरान व्यक्तिओं की हत्या और करीब 90 घरों की आगजनी की घटना का पीयूसीएल ने एक स्वतंत्र जांच दल गठित कर रिपोर्ट तैयार की थी जिसमे  छत्तीसगढ़ सरकार को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने नोटिस भेजकर सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है. आप को बता दे कि मुख्य सचिव को जारी हुए पत्र में एनएचआरसी ने बिंदुओं पर महीने के भीतर जवाब देने को कहा है. 

पीयूसीएल की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2007 में ग्राम कोंडासवालीकामरागुडा और कर्रेपारा में सलवा जुडूम अभियान के दौरान व्यक्तियों की हत्या और करीब 90 घरों की आगज़नी की घटना हुई थी. इन गाँवों की पूरी आबादी को सुरक्षा बलों और एस. पी. ओ. लोगों के द्वारा उस समय बड़ी क्रूरता से खदेड़ा गया था. गाँव वालों ने कुछ वर्ष जंगल में भटकने के बाद वापस आकर अपना गाँव फिर से बसाना शुरू किया. जुलाई 2013 में तत्कालीन सरपंच सुंडम सन्नू ने सुकमा कलेक्टरपुलिस अधीक्षक और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को, 2007 में 7व्यक्तियों की हत्या और 90 घरों के जलाये जाने की शिकायत की थी. अगस्त 2013 में सुरक्षा बलों ने अपने ऑपरेशन के दौरान इनमे से एक मृतक की विधवा पत्नीजो कि शिकायतकर्ता थीको भी मार डाला. इस गंभीर परिस्थिति में छत्तीसगढ़ लोक स्वातंत्र्य संगठन (पी.यू.सी.एल.) ने भी इस शिकायत की पुनरावृति राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष सितम्बर 2013 में की. 
हाल में 16.06.2017 को आयोग ने छत्तीसगढ़ पी.यू.सी.एल की महासचिव को प्रभावित गाँवों का दौरा कर इस शिकायत के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए निर्देशित किया. इन निर्देशों का पालन करते हुए पी.यू.सी.एल की ओर से सुश्री सोनी सोरी, सुकुल प्रसाद नागश्री लिंगाराम कोडोपीरामदेव बघेल तथा जे.के. विद्या (शोधकर्ता)एक दुभाषियेएवं पत्रकार साथियों का जाँच दल 20-21 अगस्त 2017 को काफी कठिन यात्रा करते हुए दूरस्थ ग्राम पंचायत कोंडासवाली पहुंचा. इस जांच दल की जानकारी जिला सुकमा व दंतेवाडा के पुलिस अधीक्षकों को दी गयी थी. मृतकों के परिवारजनों ने अपने बयान जांच दल के समक्ष दर्ज कराये. कोंडासवालीकामरागुडा और कर्रेपारा बस्तियों के निवासियों ने घरों के आगज़नी के मामले में अपने बयान दर्ज कराये. पूर्व सरपंच जो मूल शिकायतकर्ता थेने बयान दर्ज कराया. पूरे ग्राम पंचायत के 300 से अधिक ग्रामवासियो ने मिलकर आयोग को एक सामूहिक मांग पत्र प्रस्तुत किया. दल की महिला साथियों ने ग्रामीण महिलाओं से भी चर्चा की. विडियो बयानों और अपनी टिप्पणियों और सुझावों के साथ छत्तीसगढ़ पी.यू.सी.एल ने जाँचदल की रिपोर्टसितम्बर 2017 को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को सौपा और उनके वरिष्ट अधिकारीयों से चर्चा की.
राष्ट्रिय मानव अधिकार आयोग के अनुसार आयोग को उपलब्ध तथ्यों से ऐसा लगता है कि वर्ष 2007 में कोंडासावलीकमरागुड़ा और कर्रेपाड़ा गांवों में घरों को जलाने की घटना और सात गांववाले की हत्या हुई थी। कलेक्टरसुकमा और पुलिस अधीक्षकसुक्मा के अनुसारइस घटना के सम्बन्ध में  कोई भी मामला इसलिए पंजीकृत नहीं किया गया था क्योंकि किसी ने भी कभी भी इस गाँव के अधिकार क्षेत्र में आने वाले थाना पर कोई रिपोर्ट नहीं लिखवाई थी। 
एक जिले मेंराजस्व संग्रह और विकास की जिम्मेदारी जिला कलेक्टर की होती है। इसी तरहकानून और व्यवस्था के रखरखाव की ज़िम्मेदारीजिले के पुलिस अधीक्षक के कंधों पर है,जिन्हें इस कार्य में पुलिस स्टेशनों और पुलिस पदों में तैनात उनके विभिन्न अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा सहायता प्रदान की जाती है. अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के लिए,राजस्व विभाग के अधिकारी और विभिन्न विकास संबंधित विभाग जैसे ब्लॉक विकास अधिकारीकृषि विकास अधिकारीजिला समाज कल्याण अधिकारी और उनके अधीनस्थों को नियमित रूप से अपने क्षेत्राधिकार में गांवों का दौरा करना पड़ता है और इन यात्राओं के दौरान उन गांवों में हुई घटनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त/एकत्र करनी होती है. इसी प्रकार,विभिन्न पुलिस स्टेशनों में तैनात पुलिस अधिकारियों को नियमित रूप से सूचनाओं को एकत्रित करने के लिएजांच के संबंध में आदि के लिए अपने अधिकार क्षेत्र के विभिन्न गांवों में जाने की आवश्यकता होती है. इसके अलावाप्रत्येक जिले में प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों का एक नेटवर्क हैस्वास्थ्य उप केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र है. इन स्कूल और स्वास्थ्य सम्बंधित कार्यों को सरकारी कर्मचारियों द्वारा ही किया और संभाला जाता है. इस प्रकारएक जिले में जिला कार्यकर्ताओं का नेटवर्क काफी बड़ा और व्यापक है 

      इसलिएयह अविश्वसनीय और अस्वीकार्य है कि उपरोक्त नामित तीन गांवों में इस प्रकार की भयानक घटनाएं हुईं और जिसके शिकायत आखिरकार 2013 में दर्ज की गईजिसके बाद जगरगुंडा पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई और यह जिला सुकमा के किसी भी गांव / ब्लॉक / पुलिस पद / पुलिस स्टेशन स्तर के कार्यकर्ताओं के ध्यान में न आया हो. इसलिएआयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि ये घटनाएं पुलिसराजस्व और जिला सुकमा के अन्य अधिकारियों के ध्यान में घटना होने के तुरंत बाद आ गईं थीलेकिन पुलिस और जिला अधिकारियों ने जानबूझकर इन हत्याओं और आगजनी की घटनाओं को नज़रंदाज़ कर दिया।
वास्तव मेंराज्य और जिला सुकमा अधिकारियों द्वारा सात साल तक इन घटनाओं का संज्ञान नहीं लेना यह बहुत मजबूती से दर्शाता है कि यह अपराध सुक्मा जिले/ राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा किया गया है।
इस तरह लंबी अवधि तक इन घटनाओं का संज्ञान नहीं लेने की जानबूझकरकर की गयी चूक इस तथ्य की ओर दृढ़ता से इंगित करता है की ये भयावह अपराध जगरगुंडा बेस कैंप के एसपीओ द्वारा किये गए थेजैसा कि FIR No. 10/2013 के शिकायतकर्ता द्वारा आरोप लगाया गया है.
जिस तरीके से पुलिस द्वारा इस मामले की जांच की जा रही है और जिस तरीके से कोंटा तहसीलदार ने अपनी जांच की हैउस तरीके को देखते हुएयह स्पष्ट है कि राज्य विभागों का उद्देश्य पुलिस और प्रशासन दोनों का उद्देश्य इन घटनाओं के बारे में सच्चाई का पता लगाने का नहीं रहा है बल्कि इन अपराधों को छिपने का रहा है। तहसीलदार कोंटा की जांच रिपोर्ट और जांच अधिकारी द्वारा दर्ज बयानों का पढ़ने से पता चलता है कि उनका उद्देश्य सत्य को खोजने के लिए बिल्कुल भी नहीं है और वह केवल इस घटना का एक कवर अप ऑपरेशन कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ राज्य के सरकारी कर्मचारियों द्वारा किए जाने वाले ये कार्य कोंडासावलीकमरागुड़ा और कर्रेपारा गांव के मारे गए निवासियों और जिनके घर/ झोपड़े जला दिए गए थे के मानवाधिकारों का एक बड़ा उल्लंघन है.

आयोग ने सरकार से माँगा जवाब
आयोग ने राज्य सरकार से चार बिन्दुओ के तहत जानकारी माँगा है
दिनांक 1.1.2007 से 31.10.2013 की अवधि के दौरान गांव कोंडासावलीकामरागुड़ा और कर्रेपारा के पटवारियों के नाम की जानकारीइन तीन गांवों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले नायब तहसीलदारोंतहसीलदारोंब्लाक विकास अधिकारियोंकृषि विकास अधिकारियोखाद्य अधिकारियोंआशा कर्मचारियों के नामों की जानकारी. इन तीन गांवों से निकटतम पुलिस थानों के नाम और दूरी की जानकारी तथा 1.1.2007 से 31.10.2013 की अवधि के दौरान इन पुलिस पदों में कार्यरत अधिकारियो के नामों की जानकारी. इन तीन गांवों से जगरगुंडा पुलिस थाने की दूरी तथा  1.1.2007  से  31.10.2013  की अवधि के दौरान  थाना जगरगुंडा के थाना प्रभारी के नाम की जानकारी. दिनांक 1.1.2007 से 31.10.2013 की अवधि के दौरान इन तीन गांवों से सबसे निकटतम गाँव का नाम तथा दूरी जहां पर प्राथमिक विद्यालय स्थित हो. इन गांवों  की निकटता में स्थित स्वास्थ्य उप केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के नाम तथा दूरी. 
छत्तीसगढ़ सरकार के मुख्य सचिव को उपरोक्त मुद्दों पर आठ सप्ताह के भीतर आयोग द्वारा मांगी गई जानकारियों  पर टिप्पणी करने के निर्देश दिए गए हैं.

छत्तीसगढ़ पीयूसीएल ने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार अब इस "कवर अप" की कार्य-प्रणाली त्यागकरऔर सुकमा जिले के दूरस्थ गाँवों में रहने वाले आदिवासियों कीभारतीय नागरिकों के रूप में गरिमा और संवैधानिक अधिकारों को पहचानकरउनके विरुद्ध हुए गंभीर मानव अधिकार हनन के लिए ज़िम्मेदार अपराधियों पर सख्त कार्यवाही चाहती है