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शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

रिसेदेवी अब भी रूठी हुई हैं


Rajeev Ranjan Prasad के फेसबुक वाल से 
कांकेर से कुछ ही दूर छोटा सा ग्रामीण परिवेश है सिदेसर। नाम से स्पष्ट है कि सिद्धेश्वर का नाम कालांतर में बदल कर सिदेसर हो गया है। इस स्थल से आगे बढ़ते हुए हम एक अन्य गाँव रिसेवाड़ा पहुँचे। रिसेवाड़ा नाम के भी दो भाग है जो रिस अर्थात क्रोध तथा वाड़ा अर्थात ग्राम का अर्थ बोधक है। जैसे ही हम वाड़ा की बात करते हैं हमें नाग युगीन प्रशासनिक व्यवस्था का अवलोकन करना आवश्यक हो जाता है जहाँ उनकी सम्पूर्ण शासित भूमि राष्ट्र अथवा देश कोट (राज्य) कहलाती थी। कोट के प्रशासनिक विभाजन थे नाडु (संभाग) तथा नाडु के वाड़ि (जिला)। वाड़ि के अंतर्गत नागरिक बसाहट के आधार पर महानगर, पुर तथा ग्राम हुआ करते थे। यदि हम केवल ग्रामीण व्यवस्था को ही बारीकी से समझने की कोशिश करें तो उसके भी दो प्रमुख प्रकार थे – वाड़ा तथा नाड़ुया (नार)। समझने की दृष्टि से वाड़ा तथा नार का प्रमुख अंतर बसाहट के तरीकों में अंतर्निहित था। ऐसे सुनियोजित गाँव जहाँ घर पंक्तिबद्ध रूप में अवस्थित हों उन्हें ‘वाड़ा’ कहा जाता था जबकि अव्यवस्थित बसाहट वाले गाँव नाग युग में ‘नार’ कहलाते थे। बस्तर के नगरों गाँवों में गमावाड़ा अथवा नकुलनार जैसे कई नाम आज भी नागयुगीन प्रशासनिक व्यवस्था की स्मृतियाँ हैं। इसी प्रकाश में पुन: बात रिसेवाड़ा की।
रिसेवाड़ा निश्चित ही एक समय में सुनियोजित रूप से बसा ग्रामीण क्षेत्र रहा होगा जिसके बहुत ही निकट सिद्धेश्वर मंदिर की अपनी ख्याति होगी। सिद्धेश्वर मंदिर के पास से हमें एक बड़ा सा थान प्राप्त हुआ है जिसका आकार ही बताता है कि इससे बड़ी मात्रा में औषधि का निर्माण होता रहा होगा। यह पूरा क्षेत्र कई प्रकार की औषधि पादपों से पटा पड़ा है। पूरे रास्ते हमारे मार्गदर्शक ग्रामीण ने कई तरह के औषधि पादपों से हमारा परिचय भी कराया। मैं इन कड़ियों को जोड़ता हूँ तो लगता है कि इस प्राचीन सिद्ध क्षेत्र का महत्व ही पीड़ितों की व्याधि हरने के कारण रहा होगा तथा यहाँ न केवल धार्मिक कर्मकाण्ड, तांत्रिक विधियाँ ही पूरी की जाती रही हैं, जैसा कि सिद्धेश्वर मंदिर के सम्मुख माँ काली की प्रतिमा, भरवी की युद्ध मुद्रा में प्रतिमा आदि से ज्ञात होता है, साथ ही यहाँ एक प्राचीन औषधालय भी रहा निश्चित रूप से रहा होगा। रिसेवाड़ा अब एक उपेक्षित गाँव है। दूर दूर तक जंगल और मध्यवर्ती क्षेत्रों में खेतिहर भूमि की लम्बी कतारें, इसके साथ ही चारो ओर खिले मुस्कुराते भांति भांति के जंगली फूल, यहाँ तक उबड़-खाबड़ रास्ते से पहुँचने की सारी थकान को रह रह कर हवा कर देते थे।
एक प्राकृतिक गुफा के निकट पहुँच कर ग्रामीण ने बताया कि यह रिसेदेवी का स्थान है। यह तो समझ में आ गया कि रिसेवाड़ा और रिसेदेवी का आपस में क्या संबंध है तथापि जिज्ञासा बढ़ गयी थी। एक पहाड़ी नुमा स्थान जिसमे एक विशाल पत्थर को प्रकृति ने इस तरह लिटा दिया है कि उसके नीचे गुफानुमा संरचना बन गयी है। ग्रामीण ने बताया कि भीतर रिसेदेवी का निवास है। वस्तुत: रिसे देवी दंतेवाड़ा में अवस्थित माँ दंतेश्वरी की छोटी बहन मानी जाती हैं। दोनो बहनों में किसी बात पर झगड़ा हो गया और छोटी बहन रूठ कर यहाँ चली आयी हैं। इसीलिये देवी का नाम रिसेदेवी हो गया।
मुझे जनजातीय समाज के ऐसे देवी देवता भावुक कर देते हैं जो बिलकुल हमारे जैसे हैं। हमारी तरह झगड़ते हैं, रूठते हैं, मनाते हैं। ये देवी देवता आसमान पर नहीं उड़ते बल्कि जमीन के हैं, जमीन से जुड़े। रिसेदेवी की गुफा में प्रवेश करने के पश्चात मुझे वहाँ एक छोटी की पाषाण प्रतिमा....नहीं प्रतिमा नहीं कहूँगा क्योंकि किसी तरह का मानुषिक आकार मैं तलाश नहीं सका तथापि बहुत सारे तिलक भभूत से लिप्त एक प्रस्तराकृति को ही रिसेदेवी का प्रतीक माना गया है। आसपास मिट्टी के घोड़े, दीपक तथा अनेको कुम्हार निर्मित आकृतियाँ रखी हुई हैं। किसी तरह का कोई ताम-झाम नहीं कोई पाखण्ड नहीं। एक अत्यंत मनोरम स्थल जहाँ पहुँच कर स्वत: आपके भीतर की प्रवित्रतम भावनायें उभर आयेंगी और आपको अपूर्व शांति का अनुभव होगा। यहाँ चमक दमक नहीं है, यहाँ पुजारी पंडे नहीं हैं। यहाँ महसूस होता है इतिहास; यहाँ महसूस होता है अपना पिछड़ा जा रहा वर्तमान और यहाँ मुझमे एक कोमल अनुभूति भी प्रार्थना कर उठती है कि रिसेदेवी अब भी रूठी हुई हैं मना लो माँ दंतेश्वरी।