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रविवार, 29 जुलाई 2012

वन विभाग ने मनाया गुपचुप तरीके वन महोत्सव कार्यक्रम

कांकेर:-नक्सल प्रभावित पूरे बस्तर संभाग में घटते वनक्षेत्र और बिगड़ते पर्यावरण के मद्देनज़र प्रतिवर्ष मनाये जाने वाला वन महोत्सव कार्यक्रम का महत्व पहले की तुलना में व्यापक होने के बजाय अब मात्र एक औपचारिक महोत्सव बनता हुआ नजर आ रहा है। 

बीते कुछ दिनों पहले पूरे बस्तर संभाग सहित कांकेर जि़ले में मनाये गये इस वन महोत्सव कार्यक्रम को देखकर नही लगता है कि वन विभाग वनों सुरक्षा में कोई विशेष रूचि दिखा रही है। वन विभाग द्वारा गुपचुप तरीके से मनाये गये इस वन महोत्सव कार्यक्रम में आमजन मानस को वनों का महत्व और उनके नही होने से होने वाले दुष्परिणामों से रूबरू करना चाहिये था,लेकिन विभाग ने ऐसा नही करते हुये मात्र विभाग के कुछ कर्मचारी,अधिकारी,ठेकेदार कि स्म के लोग,तथा जनप्रतिनिधियों को बुलाकर 10-20 मिनट में ही वन महोत्सव के नाम पर औपचारिकता निभाते हुये उस कहावत चरित्रार्थ कर दिया गया जिसमें कहा गया है कि......जंगल में मोर नाचा किसने देखा? कांकेर वन अमला द्वारा मनाये गये इस वन महोत्सव कार्यक्रम को देखकर कांकेरवासियों को वह गुजरे दिन याद आते है,जब वन महोत्सव की तारीख बहुत पहले से घोषित कर दी जाती थी,नियत तिथि पर बड़े सवेरे वन विभाग के जवाबदार कर्मचारी अधिकारी इस आयोजन की महत्ता पर गंभीरता से कार्य करते हुये गाडिय़ाँ भर-भर के नर्सरीयों से सागौन,आम,नीम,गुलमोहर,बांस जैसेहज़ारों पौधे ले कर निकलते थे और तयशुदा स्थानों पर उन्हें रोपित कर वनों की महत्ता से आमजन मानस को रूबरू कराया जाता था। वन महोत्सव आयोजन में किसी मंत्री-संत्री या दिग्गज अधिकारी की प्रतीक्षा नहीं की जाती थी बल्कि क्षेत्र के सयाने बुजुर्ग, रिटायर्ड सज्जनों के हाथों से पौधे रोपित कराये जाते थे । स्कूल,कॉलेज के छात्र-छात्राओं के सहयोग से पौधारोपण कार्य दिन भर चलता था और बचे हुए सैंकड़ों पौधे आम जनता में वितरित कर मंच पर भाषणबाजी से परहेज कि जाती थी। गुजरे दिनों के डी.एफ.ओ.शैलेश अवस्थी,दयाराम थपलियाल,विनोद श्रीवास्तव,भगत साहब आज भी अपनी कर्मठता के लिए स्मरण किये जाते हैं। रियासत काल के कांकेर के डी.एफ.ओ. गंगाधर दुबे तथा बस्तर के स्व. एम.ए. मजीद खान के हाथों लगाए गए सागौन के पौधे आज विशाल वृक्षों के रूप में खड़े हैं। इनमें स्व. मजीद साहब को बस्तर अंचल में उनके वन संरक्षण कार्यों हेतु ब्रिटिश शासन ने 'मदर ऑफ फारेस्टÓ का उच्च सम्मान भी प्रदान किया गया था, जिसे पाने वालों की संख्या विश्व भर में दस से भी कम है,गुजरे जमानोंं में वृक्षों की रक्षा बच्चों की तरह की जाती थी लेकिन आज के दौर में तो वन महोत्सव के बाद वनों की सुध लेना वाला विभाग ही खुद उदासीन दिखाई पडता है पूरे प्रदेश में आये दिन अवैध कटाई से लेकर विभाग में कई भ्रष्टाचार के कई मामले समाने आते पर उन मामलों में कार्यवाही करने बजाय सरकार मात्र खानापूर्ति कर उन मामलों से इतिश्री कर लेती है। वन महोत्सव के माध्यम से वृक्षों के सरंक्षण के लिए मनाये जाने वाले इस महोत्सव को यदि वर्तमान समय में 20-20 ओवर वाला क्रिकेट मैच कहा जाये तो अतिशयोक्ति नही होगी । वन महोत्सव कार्यक्रम के माध्यम से वनों के संरक्षण के लिए पहले की अपेक्षा वर्तमान समय में कई गुना अधिक बजट शासन द्वारा वन विभागों को आबंटित कराया जाता है। किन्तु जिस ढंग से वन विभाग ने वन महोत्सव मनाने का यह नायाब तरीका निकाला है इससे अंदाजा लगाया जा सकता कि वन महोत्सव के लिए आबंटित बजट का 10 प्रतिशत अंश भी इन कार्यक्रमों में कहां व्यय किया जाता होगा । गुपचुप तरीके वन महोत्सव मनाये के मामले में कांकेर वनमंडलाधिकारी राजेश चंदेल से बात करनी चाही तो उन्होने अपने मोबाईल नं 94077-16804 पर शिव आराधना मुधुर गीत सुनाते हुये फोन उठाना मुनासिब नही समझा।