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गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

आदिवासियों की बदहाली के लिए क्षमा मांगे सरकार: राजकीय दमन बस्तरिया कब तक सहेगा


रांची के पास नगड़ी में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ पुलिस और आदिवासियों के बीच दो दिन पहले हुआ संघर्ष।
तस्‍वीर सौजन्‍य : सत्‍य प्रकाश चौधरी
बस्तर में आदिवासियों के साथ बड़े पैमाने पर अन्याय,अत्याचार को अंजाम दिया जा रह है उनके संविधानिक व मानव अधिकारों का हनन किया जा रहा है। बस्तर के आदिवासियों ने सलवा जुडूम का दर्द सहा है, घरो से बेघर होने को मजबूर हो गए है, अनेक बेगुनाहों की हत्याए देखी है, अपनों को झूटे आरोपों में जेल में बंद देखा तो नक्सलियों के के कायराना क्रांतिकारी कोर्प्रेट की गूंज की धमक भी देखी है | 
  बदकिस्मती तो यह है की इस सरकार और जनताना सरकार की लड़ाई में आम आदिवासी ही शिकार हो रह है | नुकसान आदिवासियों का ही हो रह है | आदिवासी के ऊपर सरकार के द्वारा बनाई गई सलवा जुडूम से क्या कम विनाश हुआ था जो उसने हाल है में जगदलपुर में सलवा जुडूम की तर्ज में एक और मंच खड़ा कर दिया है | जिसका  एक सूत्रीय काम है हत्याओ पर जश्न, धमकी और लूटपाट | जिसकी शिकार बस्तर के आम बस्तरिया आदिवासी तो हो ही रहे थे लेकिन उनके संविधानिक आधिकारो लोकतान्त्रिक अधिकारों पर बोलने,लिखने वाले पत्रकार, समाजिक कार्यकर्त्ता भी होने लगे | 
प्रायोजित ढंग से इन्होने निरीह आदिवासियों का दमन चालु किया, जो आदिवासी नक्सलवाद से परेशान था उन्हें ही नक्सलवाद का झूठा आरोप थोप दिया गया, लुटे गए आम आदिवासी ही ,मारे गए आम आदिवासी ही | स्वाभिमान के साथ खिलवाड़ हुआ आम आदिवासियों का ही | लोकतंत्र की हत्या तो उस दिन हो गई जब आम आदिवासी आवाज उठाना चाहे तो उसे भी छीन लिया गया उनका मौलिक अधिकार भी खत्म कर दिया गया | 
इतिहास गवाह है आदिवासियों ने अनेक जुल्म,आत्याचारो का सामना किया है | तो ये नक्सलवाद और नक्सलवाद के नाम पर अन्याय को भी जल्द उखाड़ फेंकेगे | उठ खड़े होंगे वो और अपने संवैधानिक,मौलिक अधिकारों के लिये लड़ेंगे |

आदिवासी पहचान एवं संस्कृति का हिंदूकरण कर समाप्त किया जा रहा है। जल-जंगल और जमीन से उन्हें बेदखल किया जा रहा है, हर 8 आदिवासी में से एक आदिवासी आज पहले ही विस्थापित हो चुके हैं। यह सब सोची समझी साजिश के तहत किया जा रहा है। जो उन्हें गैर आदिवासी बनाने की साजिश है। इस प्रकार आदिवासियों को संविधान में प्रदत्त 5 वीं एवं 6 वीं अनुसूची के तहत जल-जमीन व जंगल पर मालिकाना हक एवं संस्कृति का संरक्षण प्रदान करता है से वंचित किया जा सके। आदिवासियों के संविधानिक, सांस्कृतिक, आर्थिक व राजनीतिक अस्मिता को मिटाने की कोशिश हो रही है।