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गुरुवार, 28 अगस्त 2014

कांकेर में गणेशोत्सव, तब और अब मूर्तियों का स्तर उच्च हुआ, कार्यक्रमों का स्तर गिरा



तामेश्वर सिन्हा भारत में गणेशोत्सव के दस दिवसीय रंगारंग कार्यक्रमों का प्रारम्भ लोकमान्य तिलक द्वारा मुम्बई, कोल्हापुर तथा पुणे में किया गया था, जिसका उद्देश्य अंग्रेज़ शासन के विरूद्ध जन-जागरूकता उत्पन्न करना मुख्य रूप से था। सन् १८९३ से १८९७ के मध्य गणेशोत्सव सारे महाराष्ट्र तथा विदर्भ में मनाया जाने लगा और विदेशी दासता तथा मानव द्वारा मानव के शोषण के विरूद्ध जागरूकता बड़ी तेज़ी से बढऩे लगी। फिर भी कांकेर, बस्तर जैसी दूरस्थ रजवाड़ी रियासतों में सार्वजनिक गणेशोत्सव शुरू होने तक सन् १९४० का समय आ गया। इससे पहले राजापारा के नीम चौराहे पर पड़ी गणेश जी की एक पाषाण प्रतिमा के आगे दस दिनों तक दीपक जलाकर राजपुरोहित रोमनाथ महाराज और उनके बाद पं. लोकनाथ राजगुरू सादगी के साथ विधिविधान सम्पन्न करते थे। सन् १९४० के बाद शहर के कुछ उत्साही युवकों ने महाराष्ट्र की तरह गणेशजी की मिट्टी की प्रतिमा स्थापित कर सार्वजनिक गणेशोत्सव प्रारंभ कर दिया। इन युवकों में विष्णुप्रसाद शर्मा, गोविन्द शर्मा तथा राजापारा के अनेक युवक थे। इनके द्वारा भजन मण्डलियों तथा ग्रामीणों की संगीत समिति को बुलाकर कार्यक्रम किए जाते थे। आज़ादी के पश्चात् सार्वजनिक गणेशोत्सव का आयोजन कोमलदेव क्लब में होने लगा क्योंकि वहां समस्त सुविधाओं सहित सामने ही बड़ा सा मैदान भी था। क्लब तथा मैदान महल परिसर में ही थे किन्तु आज की तरह वहां आम जनता के आने जाने पर कोई रोकटोक नहीं थी। सन् १९२९ में स्थापित कोमलदेव क्लब में दुर्गोत्सव भी धूमधाम से मनाया जाता था। सत्तर के दशक तक कांकेर की परम्परा यह थी कि गणेशोत्सव/दुर्गोत्सव किसी एक स्थान पर ही सार्वजनिक रूप से भव्य तरीके से मनाए जाते थे और दसों दिन बाहर से आमंत्रित एक से एक कलाकारों के कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते थे जिनमें नागपुर के मेलोडी मेकर्स, जबलपुर के मिमिक्री मास्टर्स, नांदगांव की शारदा संगीत समिति तथा राजभारती, रायपुर संगीत समिति जिसमें रायपुर के अमीन सयानी कहे जाने वाले पवन छिब्बर तथा रायपुर के किशोर कुमार हबीब उमरानी आकर्षण के केन्द्र होते थे। छत्तीसगढ़ की लता मंगेशकर मंजुला दासगुप्ता तथा पण्डवानी की श्रेष्ठ कलाकार रीतू वर्मा, तीजन बाई आदि ने भी कई बार कांकेर में कार्यक्रम दिये हैं। दसवां दिन हमेशा कवि सम्मेलन, मुशायरे अथवा कव्वाली मुकाबलों के लिए सुरक्षित रहता था। धीरे-धीरे कांकेर के गणेशोत्सव से ये परम्पराएं लुप्त होती गईं। चारामा में अवश्य ही इन कार्यक्रमों को कई वर्षों तक जीवित रखा गया किन्तु अब हर गली में गणेशोत्सव होने के कारण बड़े कार्यक्रम नहीं हो पाते । यदि हो भी गए तो एकाध दिन नाचा या भजन कीर्तन हो जाते है। गणेश प्रतिमाओं के आकार स्तर तथा महंगी सजावट बढ़ गयी है किन्तु पहले जैसे उच्च स्तर के दर्शनीय कार्यक्रमों का अभाव है। एक बात हमें सुकून देती है कि प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों की हवा अभी यहां कम पहुंची है । यहां पीढिय़ों पुराने मांझापारा के गोस्वामी परिवार के सदस्य आज भी मिट्टी से ही गणेश प्रतिमाएं बनाने में विश्वास करते हैं ।

इसके निचे की सम्पूर्ण समाचार @राजेश हालदार  पखांजूर -पत्रिका सवादाता की रिपोर्ट है 

मूर्तिकारों के जीवन के कुछ अनछुए पहलु

 आज जहां देश के कोने कोने में विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा स्थापित होगी जिन प्रतिकृति मूर्तियों को देख हर भक्त भक्ति में लीन होगा जिन मनमोहक मूर्तियों के सम्मुख हर भक्त अपने परिवार की सुख-शांति हेतु प्रार्थना करके ईश्वर के करीब होगा वहीं इन मनमोहक मूर्तियों को आकर और सजीव रूप देने वाले मूर्तिकार अपने जीवन-यापन के मुश्किल संघर्ष की जद्दोजहद में व्यस्त होंगे। मूर्तिकार अपने जीवन-यापन सम्बन्धी मुश्किलों के वावजूद भी अपने कला द्वारा भारतीय संस्कृति को आज भी मूर्तिय स्वरुप दे रहे है।

मिटटी और रंगो से अदभुत कला से मूर्तियों में डालते है प्राण-
मुर्तिकारिता में मूर्तिकार मिटटी और रंगो का प्रयोग कर अपने कला द्वारा निर्जीव मिटटी की मूर्तियों में भी प्राण फूंक देते है। मूर्तिकार मूर्तियों के अनुरूप मिटटी का उपयोग कर आधार प्रतिकृति बनाकर उसमें रंगो का बेहतर से बेहतर उपयोग कर मूर्तियों को वास्तविकता की सीमा तक ले जाते है। भारतीय मूर्तिकला का हर कोई कायल है।

मन की भावना के अनुरूप बनता है मूर्ति का मुख-पटल -
मूर्तिकारों का कहना है की किसी भी मूर्ति का मुख-पटल उस मूर्तिकार की अंतः भावना को दर्शाता है। प्रसन्न मानसिकता में बनाए गए मूर्ति के मुख-पटल पर प्रसन्नता और होंठो पे हँसी रहती है जबकि चिंतित मानसिकता में बनायीं गयी मूर्ति के मुख-पटल पर अपेक्षाकृत कम प्रसन्नता रहती है। मन की अंतः भावना का मूर्तिकला पर बेहद असर पड़ता है।

बिना किसी आधार चित्र के मूर्तियों को देते है आकार -
अधिकांश पारंगत मूर्तिकार बिना किसी आधार चित्र या रूप रेखा को देखे मूर्तियों को अंतः मूर्तिकला द्वारा रूप-रंग देते है। भारतीय संस्कृति में कई ईश्वरीय मूर्तियों का सम्पूर्ण निर्माण मूर्तिकार अंतः मूर्तिकला द्वारा ही बिना किसी चित्र को देखे करते है।

कम आय से गुजर-बसर के लिए निरंतर करना पड़ता है संघर्ष-
मूर्तिकारों को अपने कला के अनुरूप मूर्तियों का दाम नहीं मील पाता है जिससे मूर्तिकारों को अपने परिवार के पालन-पोषण में कई दिकत्तो का सामना करना पड़ता है। परिवार पालन हेतु समुचित आय न होने से मूर्तिकार लगातार आर्थिक दृष्टि से पिछड़ रहे है। ग्रामीण क्षेत्रो में मूर्तिकारों की स्थिति अपेक्षाकृत और अधिक सोचनीय हैं।

बच्चे रहते है बेहतर शिक्षा से बंचित -
जहा एक ओर लोग ईश्वरीय मूर्तियों के सम्मुख अपने बच्चों के बेहतर शिक्षा हेतु प्रार्थना करते है वही दूसरी ओर इन मूर्तियों को आकर देने वाले मूर्तिकारों के बच्चे आर्थिक तंगी के चलते बेहतर शिक्षा से बंचित रह जाते है। मूर्तिकला से होने वाले आय से मूर्तिकारों के परिवारों का भरण-पोषण बड़ी मुश्किल से हो पाता है ऐसे में बच्चों के बेहतर शिक्षा हेतु संसाधनो का व्यवस्था करना मूर्तिकारों के लिए एक बड़ी चुनौती है।

परम्परा और संस्कृति को जीवित रखने हेतु कम आय में भी करते है काम -
मूर्तिकारों का कहना है कि उनको जो मेहनताना मिलता है वह बेहद कम है वावजूद इसके वो अपने वंशागत परम्परा और भारतीय संस्कृति को जीवित रखने हेतु लगातार अपने कला के द्वारा संघर्षपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे है। भारतीय संस्कृति में कई देवी-देवताए है जिनका विशेष आकर और स्वरुप है इन देवी-देवताओं को पीढ़ी दर पीढ़ी अपने कला के माध्यम से लोगो को अवगत करा रहे है।

प्रशासन से नहीं मिलती आर्थिक सहायता -
मूर्तिकारों का कहना है कि मूर्तिकला को बढ़ावा देने हेतु प्रशासन से किसी भी प्रकार की सहायता नहीं मिलती है। मूर्तिकला को बढ़ावा देने हेतु यदि शासकीय योजनाएं का लाभ मूर्तिकारों को दिया जाये तो मूर्तिकारों की आर्थिक संघर्षता कम हो सकती है जिससे मूर्तिकला को बेहतर आयाम मिल सकता है तथा मूर्तिकारों के बच्चो को एक बेहतर भविष्य भी मिल सकता है।

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