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शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

कांकेर जिले में वन्यप्राणी कुत्ते की मौत मर रहे...

सरकार एक ओर वनों तथा वन्यप्राणियों की सुरक्षा हेतु बहुत बड़ा बजट बनाती है, खर्च करती है तथा बहुत कुछ दिखावा करती हैं, दूसरी ओर वनों की अवैध कटाई तथा वन्य प्राणियों की मौतों का सिलसिला किसी भी तरह रूकता दिखाई नहीं देता । सारा बजट अन्य कार्यों में तथा बिल बनवाकर डकराने में समाप्त हो जाता है । इस तरह न तो वनों का कीमती काष्ठ बचता है और न ही दुर्लभ होते जा रहे वन्य प्राणी ही बच पाते हैं । हालात कांकेर के वनविभाग के अधिकारियों के कारण ही उत्प

न्न हो रहे हैं । बचे खुचे वन्यप्राणियों की कुकुरगति कांकेर तथा आसपास की रेन्जों में हो रही हे और अधिकारी लापरवाही तथा आलसीपन दिखा रहे हैं । उदाहरण के लिए कल ही कांकेर में कोरर वनपरिक्षेत्र अंतर्गत जंजालीपारा के खेत में शुक्रवार की सुबह एक मृत भालू के पास पहुंचने पर वहां मौजूद दूसरे भालू ने बीएसएफ के जवानों पर हमला कर दिया। बचाव में जवानों ने फायरिंग कर दी। इससे दूसरा भालू भी मर गया। इस घटना में तीन जवान घायल हो गए, जिनमें एक गंभीर है। उसे जिला अस्पताल में भर्ती किया गया है।शुक्रवार सुबह लगभग आठ बजे नक्सली सर्चिंग पर निकले बीएसएफ व पुलिस की संयुक्त टीम को जंजालीपारा के खेत में एक भालू के मृत पड़े होने की जानकारी मिली। टीम जब वहां पहुंची तो देखा कि मृत भालू के पास एक और भालू मंडरा रहा था। बीएसएफ के जवान जैसे ही मृत भालू के करीब जाने की कोशिश की, दूसरा भालू उन पर हमला बोल दिया। बचाव में एक जवान ने फायरिंग कर दी। बावजूद इसके भालू हावी रहा। अंतत: जवानों ने दो गोली और चला दी। इससे भालू ढेर हो गया।इस हमले में बीएसएफ के तीन जवान घायल हो गए। उन्हें तत्काल पुलिस की मदद से कोरर स्वास्थ्य केन्द्र लाया गया, जहां दो जवानों को प्राथमिक उपचार के बाद छुट्टी दे दी गई। वहीं गंभीर रूप से घायल एक जवान को कांकेर जिला अस्पताल लाकर भर्ती किया गया। 



कांकेर जिले में वन्य प्राणियों की खैर नहीं...


'वन्यप्राणियों को वन की शोभा बताने वाले खोखले नारे लगाने तथा वन्यप्राणी संरक्षण के नाम पर करोड़ों का बजट बनाकर अफरातफरी करने वाले छत्तीसगढ़ के वनविभाग के अधिकारियों को शर्मिन्दा होना और प्रायश्चित करना चाहिए । कारण यह कि विगत कई महीनों से कुछ-कुछ दिनों के अंतराल पर लगातार शहर में तेदुआं का जंगल से बाहर निकल शहर की गलियों में पलायन करना, बाघों, तेन्दुओं, लकड़बग्घों तथा हिरन-चीतलों की मौतें इनके जंगल राज में होती चली जा रही हैं और साहब लोग मात्र लीपापोती को ही अपना धर्म समझकर निबाहे जा रहे हैं । यह बात और है कि इनमें से कई जंगल-साहब तो न लीपने के हैं, न पोतने के । फिर भी जवान भालु की मौत का सारे कांकेर के पर्यावरण प्रेमियों को दुख है, तथा वनविभाग के अफसरों पर आक्रोश है कि शहर के इतने पास रहते हुए भी जंगल विभाग द्वारा गश्त लगाने और वन्यप्राणियों की रक्षा में कोताही की जा रही है । भालु की मृत्यु चाहे किसी कारण से हुई हो, जिम्मेदारी वनविभाग की ही होती है । सारे छत्तीसगढ़ में वन्यप्राणियों की दुर्गति है लेकिन कांकेर जिले में तो कुकुरगति है ।