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शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

वनवासियों का विनाश योजना बनाम रावघाट परियोजना




०मूलनिवासियो  की जिविका पर पड़ेगा असर, 
० परियोजना से क्षेत्रवासियों को कुछ नही मिलेगा, 
मूलनिवासियो के पेट में लात मरने जैसा परियोजना,
०क्या पर्यावरण विभाग है इन सब से अनजान?
 रावघाट परियोजना क्षेत्र का विकास कम विनाश ज्यादा करेगी, अंतागढ़ क्षेत्र वासी परियोजना बंद करने की मांग कर रहे है, साथ ही परियोजना प्रदूषण को न्यौता देगी अगर हम प्रदूषण की बात करते है, तो जल, थल, वायु ये तीनों ही प्रदूषण के चपेट में आ जाऐगी जो मानव जीवन के लिए तीनों चीजें महत्वपूर्ण है।
     
क्या मूलनिवासियो  के हक तथा जीवन पर पडेगा असर? 
रावघाट परियोजना के चालू होने के पूर्व इस क्षेत्र में वनों को इस परियोजना की भेंट चढ़ा दी जाऐगी, वह वन जिसके तहत मूलनिवासी अपनी जिविका, तथा वनों को देवी-देवता मानते है, वो इस रावघाट परियोजना की बली चढ़ जाऐगें। क्षेत्रवासी के जनजाति अपनी-अपनी जिविका के साथन चलाते है यहा के वनवासि साल, हर्रा, बेहड़ा, महुआ, लाख आदि वनोपज बेच कर अपना पेंट भरते है और अपना जिवन यापन करते है। क्षेत्रवासियों तथा वनवासियो को ये वृक्ष साल भर कुछ ना कुछ जिविका का साथन देते रहते है, वनवासियों का ये एक अर्थिक स्त्रौत है, तथा जिविका यापन करने का एक मात्र जारीया, है। अगर रावघाट परियोजना चालु होती है तो वृक्ष काटना तो आम है तथा वनवासियों के पेंट पर यह परियोजना लात मारेगी?। वनवासियों के जीवन का एक मात्र जारीया इस परीयोजना से स्मप्ता हो जाऐगा। या फिर बी.एस.पी  साल, हर्रा बेहड़ा, महुआ जैसे किमती वृक्षो को काट कर, परियोजना चालु होने के पश्चात फिर वंही पेंड लागाऐगी या फिर बेकाम जो वनवासियों के जीवन का साथन नही बन सकता वैसे हाईब्रिड नीरगिरी, करंज, जैसे वृक्ष लगाकर खानापूर्ती करेगा?। रावघाट परियोजना अप्रत्यक्ष रूप ये वनवासियों के जिविका के ऊपर सीधा असर करेगा?। अगर ऐसा होता है तो वनवासियों के जिविका का साथन क्या होगा? कंहा जाऐगा क्षेत्र वासी अपनी जिविका चलाने?।

परियोजना से वन्य प्राणियों का क्या होगा,? ना घर के ना घाट के होंगे वन्य प्राणी...
रावघाट परियोजना के चलते वनों की कटाई होगी तो वंह रह रहे वन्य पा्रणियों का क्या होगा कंहा जाऐगा जंगल में राज करने वाले वन्य प्राणी? या फिर बी.पी.एस द्वारा मैत्री बाग की तरह वन्य प्राणियों को बंधक बनाकर लोगों को टीकीट देकर देखने के लिए रखेगी? और अपना आय का जारिया इसे भी बना लेगी। वन्य प्राणी को अधिकतर इसी क्षेत्र में ज्यादा देखा ज्यादा है, एक ओर तो वन्य प्राणियों के लिए अधिनियम तैयार कर इनके बचाव के लिए लाखों खर्च किये जा रहे है, तथा एक और इस परियोजना से वन्य प्राणियो की रक्षा पर खतरा मंडरा रहा है, परियोजना के चलते वन्य प्राणी कंहर पलायन करने को मजबूर ना हो जाऐ?और बेमौत मारे ना जाऐ, जिससे इस परियोजना के चलते वन्य प्राणियों के सरक्षंण पर भी खतरा मडरा रहा है?।

रावघाट परियोजना से क्षेत्रवासियों को कुछ नही मिलेगा..
अंतागढ क्षेत्र वासी रावघाट परियोजना खुलने का कई सालों से इंतजार कर रहे है, लेकिन अब-जब परियोजना शुरू होने वाली है तो क्षेत्रवासियों में मासूमी छाने लगी है, इसका कारण है रावघाट परियोजना से जुड़े अधिकारियों एंव कर्मचारियों का अंतागढ़ के क्षेत्रवासियों के साथ किया जा रहा है, चंद कुछ नेताओं तथा दबंग व्यक्तियो के चलते वनवासियों को उनका लाभ नही मिल रहा है। उनके साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। रावघाट परियोजना में अंतागढ़ ब्लाक का हिस्सा ९० प्रतिशत आ रहा है, जिसके बावजूद परियोजना से संबंधित सभी विभाग एवं टाऊनशिप, हास्पिटल, स्कूल अन्य जिला में खोला जा रहा है। जिसकी मांग अंतागढ़ किया जा रहा है, जो मांग जायज है दुसरी ओर यहा के बेरोजगार साथियों के लिए तो बी.एस.पी के पास तो इस परियोजना में रोजगार का तो कोई योजना ही नही है। अगर इस क्षेत्र के नौजवानों को परिक्षण देना है तो माईन्स से सबंधित प्रशिक्षण देना चाहिए जिससे इस परियोजना में उन्हे स्थाई नौकरी मिल सके।

क्या पर्यापरण विभाग इन सब से अनजान है, या फिर नही?
० पर्यावरण विभाग को जानकारी तो होगी की वनो से वनवासियों को क्या-क्या लाभ होता है? और ये वन ही इनके अजिविका का साथन है। 

० जंगल में रहने वाले वन्य प्राणियों का क्या होगा? जंगल साफ होने के बाद वन्य प्राणियों की किस तरह से कुकुरगति होगी इसका अंदाजा तो विभाग को होगा?। 

० अगर परियोजना के चलते वृक्षों की कटाई होगी तो वनवासियों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा? जिसे, वे अपना देती देवता सदियों से मानते आ रहे है?। 

० खदान से निकालने वाले डस्ट से जल, थल और वायु प्रदूषण से यंहा के वनवासियों जल, जंगल, जमीन व अपना स्वास्थ्य सभी चीजों से अपना हाथ धौ बैठेगें?। जंहा हरे-भरे वृक्षों में सांस लेने वाले वनवासी वायु प्रदूषण का दंश झेल पायेंगे?। 

ये सभी चीजों को जांचे-परखे जाने बगैर पर्यावरण मंत्रालय ने हरी झंडी कैसे दे दी? जो परियोजना वनवासियों की जिविका से लगा हुआ है तथा इस परियोजना के शुरू होने से वनवासियों के पेट में लात मारने के बराबर है लेकिन पर्यावरण मंत्रालय ने अनुमति दे दी यह समझ से परे है। क्या बी.एस.पी द्वारा पर्यावरण मंत्रालय को गुमराह किया है? शायद इन सभी वनवासियों के समस्यों को सेल द्वारा  पर्यावरण मंत्रालय के सामने नही रखा गया होगा?। आखिरकर बीएसपी ने ना ही मानव जीवन ही वनों ही नही वन्य प्राणियों को अनदेखा कर इस परियोजना पर जीत पा ली है। अब देखना यह है कि यह रावघाट परियोजना वनवासियों के लिए वरदान बनता है या फिर अभिशाप?।