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मंगलवार, 5 जून 2012

कांकेर की गर्मी ने1974 की याद दिलाई ...


कांकेर । यू तो इस वर्ष गर्मी ने देश के प्राय: 
सभी शहरों में रिकार्ड तोड़े हैं किन्तु कांकेर 
में अति हो गई है और पुराने लोगों को १९७४ की याद आ रही है, जब इसी तरह की भीषण गर्मी में सैकड़ों चमगादड़ों के साथ ही घरेलू गौरैया तथा कौंओं की भी संख्या बहुत कम रह गई थी । सन् १९७४ में कांकेर में आब्जर्वेटरी तो थी नहीं अत: तापमान के आंकड़े उपलब्ध नहीं है किन्तु लोगों की यादों में अब भी अंकित है कि वह गर्मी इस साल की गर्मी से किसी मायने में कम नहीं थी । भरी दोपहर में चमगादड़ सैकड़ों की तादाद में कोमलदेव क्लब के पीछे वाले तालाब में आकर पानी पीते और पांच मिनट में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे । अनेक कौए, मुर्गे तथा गौरैया भी भीषण गर्मी सहन नहीं कर सके और मारे गए । लू लगने से शहर के कुछ वृद्धों तथा बच्चों की भी मौतें हो गई थीं । कांकेर का अस्पताल मीरजों से भर गया था । अनेक लोगों ने धमतरी बठेना के अस्पताल में भर्ती होकर जान बचाई थी । इस साल के हालात भी कमोबेश यही हैं । नई बात यह हुई है कि नौतपा के बाद भी गर्मी बढ़ती जा रही है और पारा ४६ डिग्री को छू रहा है जो कि रायपुर के बराबर ही चलता आ रहा है बल्कि कांकेर के राजापारा का तापमान तो इससे भी एक दो डिग्री अधिक ही रहता है, जिसका मुख्य कारण है गढिय़ा पहाड़ से लगा हुआ होना जिसके गर्म पत्थरों को ठण्डा होने में सवेरा हो जाता है । लोग उन दिनों को भी स्मरण कर रहे हैं जब गर्मी की रातों में दूधनदी की रेत पर देर रात तक कांकेर वासियों की साहित्यिक गोष्ठी, लोकगीत गोष्ठी से लेकर गप गोष्ठियां तक चला करती थीं । अब तो दूध नदी मात्र एक गंदा नाला रह गई है, अत: गोष्ठियां बन्द हैं और लोग येनकेन प्रकारेण गर्मी के दुख भरे दिन बिताने पर विवश हैं ।